नवयुग की बेला, युवाओं का मेला - विदुषी प्रज्ञा
*" हमारी रगों में जो लहू है वो देश की तकदीर बदलेगा , ये आज का युवा ही कल नए भारत की तस्वीर बदलेगा "*
*" उठो हे युवा* ... तुम बदलते देश की तकदीर हो ,
परिश्रम और हौसलों से खींची एक अमिट लकीर हो ।
बीत गई सो बात गई अब नया सवेरा लाना है ,
अपने ज्ञान और कौशल से भारत का मान बढ़ाना है ,
नकारात्मकता के जालों को अब मिलकर हमें हटाना है ,
हर सवाल का जवाब देश की प्रगति से दे जाना है ,
अज्ञान की फटी चादर उतार अंतस में शिक्षा का दीप जलाना है ,
अपने हुनर के पंखों से देश को आगे बढ़ाना है ,
कलम उठाकर , तकनीक अपनाकर नया इतिहास रचाना है ,
अपनी रगों में बहती ऊर्जा से धरा आकाश सजाना है ,
सिस्टम की हर खामी में अपनी मेहनत से सुधार लाना है ,
देश के उज्जवल भविष्य को अब मिलकर संवरना है ,
*हे युवा*.... तुम केवल आज नहीं भारत का स्वर्णिम कल हो ,
हर समस्या हर चुनौती का तुम एक मात्र हल हो ,
तो क्यों ना ....आओ एकजुट होकर क़दम बढ़ाए...
क्योंकि..... *यह नव निर्माण की बेला है* ,
*विश्व मंच पर चमक रहा हम युवाओं का मेला है*
रचनाकार -विदुषी प्रज्ञा 

दिल्ली-

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