अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी की
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु
प्रकृति - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
प्रकृति की सुन्दर लीला है
शाम सवेरा होता रहता है ।
अंधकार जब रात का छंटता
एक नई सुबह सवेरा होता है ।
समय गति से अपना चलता
समय के साथ दौर बदलता ।
बदलता दौर कभी न रूकता
समय के साथ ही चलना पड़ता ।
सुबह सवेरे सूर्यदेव निकलते
दिन भर आसमान में रहते ।
शाम हुई अस्ताचल में जाते
रात भर वो विश्राम करते ।
समय का चक्र हमेशा चलता
धूप छांव सा बदलता रहता है ।
घनघोर अंधेरी रात का छटता
एक नई सुबह सवेरा हो जाता है ।
प्रकृति की सुन्दरता रचने
मौसम भी बदलते रहते हैं ।
ठंड गर्मी बरसात के मौसम
समय के साथ बदलते रहते हैं ।
बसंत का मौसम भी आता है
सबसे सुहाना मौसम होता है ।
सुन्दर मौसम का सवेरा होता
पेड़ पौधों में पतझड़ होता है ।
एक नई सुबह की सुन्दरता
सभी के मन को भाती है ।
नित्य कर्म सुबह से होते हैं
जीवन में खुशियां मिलती है ।
प्रकृति न कुछ भूलती है
न कुछ भी भूल करती है ।
प्रकृति नियम समय पर चलता
समय लौटकर फिर नहीं आता ।
प्रकृति के गर्भ में क्या छुपा है
किसी को कुछ भी पता नहीं है ।
प्रकृति ने हमको जो दिया है
जीवन उससे खुश हाल हुआ है ।
प्रकृति की लीला न्यारी है
प्रकृति कितनी सुन्दर प्यारी है ।
प्रकृति को देख खुशी मिलती है
हरदम हमको खुशियां देती है ।
वायु प्रकाश जल मिलता है
पर्वत नदियों सूर्य से मिलता है ।
पेड़ पौधे सब प्रकृति की देन है
मीठे फल पेड़ों की ही देन है ।
सुख दुख भी प्रकृति की देन है।
समय पर आते-जाते रहते हैं ।
कभी भूकंप कभी सुनामी
प्रकृति के ही हिस्से होते हैं ।
प्रकृति के आंचल में रहकर
जीवन हमने सफल बनाया है ।
प्रकृति की अदभुत लीला से
सुन्दर संसार जो पाया है ।
महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
जबलपुर म प्र

No comments:
Post a Comment