अब नहीं सहूंगी - ललित कुमार शर्मा
मैं धरा हूँ तुम्हारी
ध्यान से सुनना मुझे
जो भी मैं तुमसे कहूँ
फ़िर सही विकल्प चुनना है तुझे
जिस धरा ने कण कण से अपने
हर प्राणि को नव जीवन है दिया
सोच कर देखो ज़रा तुम
क्या कुछ नहीं तुमने
मुझसे है लिया
बो कर फसलें सदियों से
अन्न तुम लेते रहे
लेकर मीठे फल सदा
ज़हर मुझको देते रहे
चीर कर छाती धरा की
खनिज सारे हर लिए
लूटकर सब कुछ धरा से
अपने खजाने भर लिए
जैसा जब चाहा वैसा
तुमने मेरा शोषण किया
खोद खोद खाया मुझे
बस अपना भरण पोषण किया
क्या यही सीखा है तुमने
जो भी दिखे धरा पर
अपना समझकर छीन लो
बस अपना मतलब साधो
चाहे फिर धरा जीवन विहीन हो
यूँ तो धरा को धरती माँ
कहते हो तुम
फ़िर कैसे अपनी ही माँ पर
ये ज़ुल्म सहते हो तुम
कर चुके तुम जो गलतियाँ
कब तक उन्हें दोहराओगे
एक दिन तो वो आएगा
जब कीमत उसकी चुकाओगे
कब तक चुप बैठी रहूँगी
और तुमसे धोखा मैं खाऊंगी
बस ये दर्द कितना सहूँगी
एक दिन तो मैं चिल्लाऊंगी
तुमने शायद इस धरा का
अब तक रोना देखा नहीं
तुमने बस सीखा है पाना
अब तक खोना देखा नहीं
क्या होता है खोना
जिस दिन तू यह जान पाएगा
होगी यह धरा आसमां औेर
फिर आसमां धरा हो जाएगा
अब बस बहुत हो गया
बदल लो अपने व्यवहार को
कर लो संरक्षण अपनी धरा का
रोक दो इस अत्याचार को
मैं धरा, तुम सबसे अब यही कहूँगी
इन बंधनों से मैं अब मुक्त होकर रहूँगी
तुम्हारा ये अत्याचार मैं अब नहीं सहूँगी
तुम्हारा ये अत्याचार मैं अब नहीं सहूँगी
स्वरचित एवं मौलिक रचना
ललित कुमार शर्मा
नई दिल्ली

No comments:
Post a Comment