Saturday, 13 June 2026

माँ वसुंधरा का नव श्रृंगार - विदुषी प्रज्ञा

माँ वसुंधरा का नव श्रृंगार"*

*" तरू पल्लव का हार पहनकर ,
जब *मां वसुंधरा* मुस्काती है,
मलयज की पावन गोदी में ,
तब सृष्टि भी शीश झुकाती है ।

अमृत-सी बहती नदिया भी ,
जीवन का सार सुनती है ,
प्रकृति के इस पावन आंचल में ,
जन्नत भी ठहर जाती है ।

ऋतुराज निखरता उपवन में ,
कली-कली मुस्काती है ,
भौरों का गुंजन सुन-सुन कर,
यह माटी भी मुस्कुराती है ।

परछाई हरी इन *वृक्षों* की ,
शीतल करती हर राही को ,
शाखाओं पर बैठी कोयल भी,
भौंर के तराने गाती है ।

पर , स्वार्थ की अंधी वेदी पर ,
मानव ने इसे उजाड़ा है ,
काट कर हरे भरे आंचल को ,
प्रदूषण को पुकारा है ।

तप रही धरा अब संकट में ,
आई विपदा भारी है ,
मौसम के बदलते चक्र देख ,
जन-जन की सांसें भी हारी है ।

अब वक्त आ गया संभालने का ,
यह कर्तव्य हमें निभाना है ,
हर हाथ में लेकर एक पौधा ,
माटी को सहलाना है ।

प्लास्टिक के इस अभिशाप से ,
मुक्त कर *माँ वसुंधरा* को ,
जल की हर एक बूंद बचाकर ,
जीवन का मान बढ़ाना है ।

जब महकेगी यह माटी अपनी ,
तभी सुरभित यह संसार होगा ,
तभी हमारी *"जननी मां"* का ,
पूरा सत्कार होगा ।

अब , बहुत हुआ चलो.....


सुंदर बने *पर्यावरण* हमारा ,
यही पथ , यही संकल्प , यहीं साधना है ,
आओ बचाएं अपनी धरती ,
यही सच्चे अर्थों में हमारी वंदना है ।।

*"जब महकेगी रज चंदना , धरती पर सुख अपार होगा , वृक्षों की हरी साड़ी में मां वसुंधरा का नव श्रृंगार होगा "*

- विदुषी प्रज्ञा ✍️
दिल्ली- 

No comments:

Post a Comment