Wednesday, 10 June 2026

संघर्ष - संजय जैन "बीना"

संघर्ष - संजय जैन "बीना"
विधा : कविता

जोड़ सको तो जोड़ो तुम
क्यों तोड़ने की कोशिस करते। 
दिल का तेरा हाल बुरा है 
क्यों दिलों से खेलते हो।। 

आज तेरा जो रूप देखा 
सच में दिल घबरा गया। 
कैसे हो सकता है कोई
प्यार से इतना भरा हुआ।। 

कितने गमों को सह कर भी
बिल्कुल विचलित नही हुआ है। 
दृण्य संकल्प लेकर जीता है
सपने अपने पूरे करता है।। 

संसार के माया जाल को
भली-भाती समझा जाना है। 
फिर भी छलने वालों को 
साथ में अपने रखता है।। 

अपने ही दुश्मन बनते है 
गैरो में कहाँ इतनी दम है। 
घर में साथ हमारे बैठकर
हमको ही वो डसते है।। 

वाह रे ऊपर वाले तेरी लीला
किस तरह से तुम रचते हो। 
अपनों को ही अपनों से तुम
किस तरह लड़वाते रहते हो।। 

हम तो लड़ने झगड़े के अब
सच में आदि से हो गये। 
जीना मरना देख लिया है
तो मरने से डर लगता नही।। 

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई

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