मन का बगीचा - अमिता मराठे
विश्व पर्यावरण दिवस पर आत्ममंथन का अवसर पाकर
आइए, हम सब मिलकर परिवार और धरती को संजोएँ।
अनन्त शुभकामनाओं सहित—
शीर्षक
मन का बगीचा
उस समय तक सब कुछ सुंदर था,
प्रकृति के पाँचों तत्वों से
हमारा गहरा और आत्मीय नाता था।
मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू का
रसोईघर तक प्रभाव था।
नदी, जंगल और पर्वत
जीवन के सच्चे आधार थे,
जैव विविधता के संरक्षण का
प्रत्यक्ष भाव हमारे भीतर था।
तभी समाज और राष्ट्र
समृद्ध और आबाद था,
और मन का बगीचा
सदैव प्रसन्न एवं हरा-भरा था।
फिर विकास की दौड़ तेज हुई,
धरती की हरियाली रोने लगी।
विज्ञान की खोजें बढ़ती गईं,
परिवार और वसुंधरा
दोनों प्रभावित होने लगे।
नारी की घरों में सहभागिता घटी,
और मन की बगिया
धीरे-धीरे सूखने लगी।
प्रकृति तो हर पल
देना ही जानती है,
किन्तु लेने में हम
कंजूसी बरतने लगे हैं।
स्वास्थ्य की चिंता में डूबा मानव
दवाइयों की दुकानों पर
भीड़ लगाने लगा है।
अब समय है कि
पर्यावरण संरक्षण के भावों की
मन के बगीचे में मजबूत नींव रखी जाए।
सकारात्मक विचारों,
शांति और सुकून के बीज बोए जाएँ,
और उन्हें निरंतर
सद्कर्मों के जल से सींचा जाए।
शुद्ध आकांक्षाओं के फूल,
विश्वास की कलियों की महक
सदैव बनी रहे
हमारे मन के बगीचे में।
तभी धरती भी मुस्कुराएगी
और मानव जीवन भी
सुख, शांति और हरियाली से भर जाएगा।
अमिता मराठे
इंदौर मध्य-प्रदेश
लेखिका एवं समाज सेविका

No comments:
Post a Comment