Sunday, 21 June 2026

महंगाई - जितेन्द्र टेलर जीत


महंगाई - जितेन्द्र टेलर जीत 

समय चक्र नित गतिमान है, ध्वनि एक है हर युग में दी सुनाई ।
आज भी गूंज रही गली गली में, बढ़ गई है बहुत महंगाई ।
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महंगाई के लिए हमें बता दो, आखिर यह किस पथ से है आई ।
ऊंचे पर्वत शिखरों से उतरी,अथवा प्रकटी है किसी गहरी खाई ।
महंगाई लगती संध्या सूरज किरणों की, फैली अतिकाय लंबी परछाईं ।
समर्थ भय से है परलोक पहुंचाने में, जैसे घटोत्कच की हो हिडिंबा माई ।
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सुबह शाम घर-बार अखबारों में, महंगाई की ही होती चर्चा है ।
आटा-दाल तेल गैस शक्कर सब्जियां, अधिक दाम का छपा पर्चा है ।
रोता श्रम पर जीवित रहने वाला, आय कम और ज्यादा खर्चा है ।
पर महंगाई क्यों कैसे है किस कारण, होती नहीं कहीं इस पर चर्चा है ।
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विश्व पटल पर हमें घटनाओं का, समझना होगा उतार चढ़ाव ।
आयातित पर सीमा कर को, है करते प्रभावित युद्ध अलगाव ।
राष्ट्रहित में स्व उत्पादन पर भी, है बढ़ जाते अक्सर वस्तु भाव ।
मूल्य भी अतिक्रमण कर जाते, जब चले जाते राजनीतिक दांव ।  
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विकराल महंगाई के रूप वृद्धि में, सहयोग है पुरा पुरा हमारा ।
मढ़कर दोष दुनिया के माथे, हम कर सकते नहीं इससे किनारा‌ ।
अपनी चादर से भी ज्यादा तो हमने, अपने पैरों को है पसारा ।
आवश्यकता से अधिक चीजों का, लगा रहे घर में हम अंबार सारा ।
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क्रेता बनकर तुम व्यर्थ दुख पाते, महंगाई सातवें आसमान चढ़ गई है ।
अपनी मजदूरी आय भी तो देखो, वह भी तो कितनी बढ़ गई है ।
वर्तमान को न अतीत से तोलो, परिस्थितियां अब सब नई है ।
शहर गांव और सड़क गलियों की, सूरत कितनी बदल गई है ।
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स्वविवेक को जगाओं राष्ट्रहित में, लगी ह्रदय में कौनसी कटार है ।
युवा प्रौढ़ सब भ्रमित अर्ध ज्ञान से, शोर करते हम बेरोजगार हैं ।
हाथ हुनर और मेहनत का हमेशा हमने किया पग पग तिरस्कार है ।
है देश में सीमित सेवा संसाधन, असीमित जनसंख्या का बढ़ता भार है ।
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नित प्रति हमे धन ज्यादा चाहिए, न दिखती हमें इस नीति में बुराई ।
दुगुना तिगुना मिलें मुझे मुनाफा, चाहें न मेहनत पूंजी पूरी लगाई ।
अपने कर्मों को करके अनदेखा, सबने सदैव दूसरों पर लेखनी चलाई ।
विडंबना है यह अपने देश की, सब कहते हैं फिर बढ़ गई महंगाई ।
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पता - जितेन्द्र टेलर जीत / मोड़ीराम जी टेलर 

बरडिया 
तहसील -प्रतापगढ़ 
जिला - प्रतापगढ़ 
राजस्थान 

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