क्या मिटने की हद तक जाओगें !!
वन्य जीवों का संरक्षण..कर लो
पृकृति स्वतः संरक्षित हो जायेगी ।
दोनो एक दूसरे के पूरक है,आपदा
मानव जाति को,छू भी नही पायेगीं ।।
वन भौतिकता की भेंट चढ़ चुकें है,
आज के इस, समय विकराल मैं ।
वन्य जीव आशियाना ढूड़ते ढूड़ते..
समा ही जायेंगे, काल के गाल मैं ।।
कांक्रीट के जंगल में तुम स्वय् कैद हो..
इनका ठिकाना चिड़ियाघर बना दिया ।
सबसें सभ्य विकसित मानव प्रजाति
तूने तो पैर ही,कुल्हाड़ी पर मार लिया ।।
संरक्षण करों वन्य प्राणी और प्रकृति का ।
येही पर्याय है जन्म मृत्यू की आवृत्ति का ।
लाशें ढ़ो नही पायें थे हम,करोना काल में।
सरकारें असहाय रही, समय विकराल मैं।।
कृत्रिम हवा के लिये कितनी मारा मारी थी।
वे भी रोये थे जिनकी जेबे अथाह भारी थी।
महामारी का दौर चलेगा, सभ्यतायें..
फल फूल , और पनप नही पायेंगी ।
व्यापक सोच से विनाश को रोक लो..
अगली पीड़ियाँ माफ़ नही कर पायेंगी ??
गमले मै लगे पौधे,
बोझ धरा का ढो नही पायेगें।
अस्तित्व को चुनौती है,तेरे..
शुभचिंतक रो भी नही पायेगें।
कराह रही है पृथ्वी,
साँसे फूली फूली है ।
अपशिष्ट भरा है नदियों मै,
नदियाँ भी मैली मैली है ।।
अथाह कार्बन उत्सर्जन से,
तड़फ़ती सी जिन्दगी है ।
तिल-तिल कर मरना ही,
क्या पृथ्वी तेरी मजबूरी है ??
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स्वरचित...
डाॅ. योगेश सिंह धाकरे "चातक"
( म.प्र )
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