पेड़ - गोरक्ष जाधव
न जाने पेड़ क्या सोचते रहते हैं,
खामोशी से नेकी करते रहते हैं।।
पेड़ फल, फूल और ठंडी-ठंडी छाँव देते हैं,
धूप की तपिश और पत्थरों के घाव,
चुपचाप सहते हैं,
दर्द छुपाकर भी मां जैसे मुस्कुराते हैं।
न जाने......
पंछियों के कितने सारे घरौंदों को
अपने कंधों पर झुलाते हैं
कई हाथों से उन्हें खिलाते हैं
भू-धरा की शोभा,आन लेकर पालते रहते हैं।
न जाने......
निर्धन या हो धनवान
दोनों की सेवा करते हैं
मोल सेवा का कभी नहीं मांगा करते हैं
बस समानता की नजर सें
सभी को दुलारते रहते हैं
न जाने पेड़ संत बनकर शांत कैसे रहते हैं।
न जाने ......
काटने वालों को छाँव
और खुद घाव सहते रहते हैं
कटकर कभी किसी के लिए,
उपयोगी होने की उम्मीद बँधे रहते हैं
भाग्य जलना है उनका
जलकर भी सभी को ऊर्जा देते रहते हैं।
न जाने पेड़ क्या सोचते रहते हैं,
खामोशी से नेकी करते रहते हैं।
गोरक्ष जाधव
महाराष्ट्र

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