चक्र बाजार का - विदुषी प्रज्ञा
* पैसे का जो खेल है बाबू यही है *अर्थव्यवस्था*,
* यही तय करती है दुनिया में कैसी होगी व्यवस्था ।
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* बाजार टिका है दो चीजों पर *मांग और आपूर्ति* भाई ,
* एक भी पटरी से उतरे तो समझो आफत आई ।
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* खरीदार ज्यादा हो और समान मिले जब कम ,
* तो *मुद्रास्फीति* यानी महंगाई निकाल देती है दम ।
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* पैसे की कीमत घट जाती चीजें छूती है आसमान ,
* सब्जी भाजी के दाम देखकर डरने लगते हैं तन के प्राण।
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* ऊपर से जब आग लगाती हैं *वैश्विक ऊर्जा और महंगाई* ,
* तेल गैस और पेट्रोल में हर जेब में आग लगाई ।
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* गाड़ी चलाना भारी पड़ता कारखाने भी रोते हैं ,
* इसके बढ़ते ही दुनिया में सारे बजट बिगाड़ते हैं ।
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* देश कितना कमा रहा है ये बताती है *जीडीपी* ,
* यह बढ़े तो सब चंगा है चढ़ती है तरक्की की सीडी ।
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* पर धंधा पानी ठप हो जाए और बंद हो जाए सब की कमाई ,
* नौकरी जब जाने लगे तो समझो *मंदी* आई ।
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* तब बैंकों का बड़ा बैंक एक नया दांव चलता है ,
* लोन महंगा या सस्ता करने को *ब्याज दर* बदलता है।
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* ब्याज बढ़कर नोट समेटे घटाकर बाजार चलता है ,
* इसी उठा पटक में ही बाबू हमारा जीवन काटता है ।
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* रचनाकार विदुषी प्रज्ञा
* दिल्ली 6
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