Sunday, 21 June 2026

अर्थयुग का संकट - डॉ प्रो कस्तूरी बाई

अर्थयुग का संकट - डॉ प्रो कस्तूरी बाई

समय मौन है,
 पर संघर्ष मुखर है।
न रणभेरी बजती है,
 न शस्त्रों की टंकार।
फिर भी जीवन के आँगन में
 एक युद्ध निरन्तर है।
मुद्रास्फीति की ज्वाला
 आशाओं को झुलसा रही है।
महँगाई का दावानल
 हर घर तक पहुँच गया है।
रसोई की आँच में
 चिन्ताएँ भी पकती हैं।
श्रमिक का पसीना
 सस्ता होता जाता है।
कृषक का परिश्रम
 मूल्य खोजता फिरता है।
वैश्विक ऊर्जा का संकट
 सीमाएँ नहीं जानता।
एक देश की हलचल
 संसार को प्रभावित करती है।
तेल की बढ़ती कीमतें
 विकास को चुनौती देती हैं।
जीडीपी के स्वर्णिम आँकड़े
 आकाश में चमकते हैं।
किन्तु धरती का मनुष्य
 अब भी संघर्षरत है।
संख्याओं का वैभव
 सुख का प्रमाण नहीं।
याजदर की कठोरता
 व्यापार को बाँध लेती है।
निवेश की गति
 मन्थर पड़ जाती है।
माँग और आपूर्ति का संतुलन
 जब डगमगाता है,
तब बाजार का विश्वास
 भी काँप उठता है।
धीरे-धीरे
 मंदी उतरती है।
स्वप्न सिकुड़ते हैं।
अवसर घटते हैं।
किन्तु अन्धकार शाश्वत नहीं।
हर संकट के भीतर
 समाधान का बीज होता है।
दूरदर्शी नीति,
 संतुलित विकास,
नैतिक व्यापार,
 श्रम का सम्मान—
यही समृद्धि के स्तम्भ हैं।
अर्थ का उद्देश्य
 केवल धन नहीं।
मानव-कल्याण ही
 उसकी चरम सार्थकता है।
जहाँ विकास में संवेदना हो,
 जहाँ प्रगति में समानता हो,
वहीं राष्ट्र का भविष्य
 उज्ज्वल होता है।
वहीं अर्थव्यवस्था
 मानवता का उत्सव बनती। 

डॉ प्रो कस्तूरी बाई 
कर्नाटका 

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