प्रकृति - कमल धमीजा
अपनी -अपनी सोच है प्यारे
सबके अपने है विचार
कोई देता है चोट मुझे तो,
कोई देता है प्यार
सूखा पेड़ सोचता होगा
वाह! मतलब का संसार
मैं देता था छाया इनको,
यह करते हैं वार
धुआँ धुआँ सा जीवन होगा
होगा! हर कोई बीमार
साॅंसे होगी उखड़ी -उखड़ी,
होगें सभी लाचार
उड़ते पंछी भी सोचते -होंगे!
बिछड़ गया परिवार
वो दिन जल्दी ही आएगां,
जब! पड़ेगी कुद़रत की मार,
अब भी बंदे समझ जा, इतना
करों! प्रकृति से प्यार
हरे -भरे सब पेड़ लगाओ,
करो धरती का श्रृंगार
प्रकृति देती दुलार!
स्वरचित मौलिक अधिकार रचना
कमल धमीजा
फरीदाबाद- हरियाणा
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