Sunday, 21 June 2026

महंगाई का दानव - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

महंगाई का दानव - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

(प्रतियोगिता हेतु साहित्यिक कविता)
महंगाई का दानव देखो,
कैसा विकराल हुआ है,
हर घर का बजट आजकल,
मानो बेहाल हुआ है।
चूल्हे की लौ मंद पड़ी है,
थाली भी अब रोती है,
मां की चिंतित आँखों में,
नींद कहाँ फिर होती है।
सब्ज़ी, दाल और आटे ने,
बढ़कर नया इतिहास लिखा,
मेहनतकश के पसीने का,
जैसे किसी ने मोल चुकाया।
बच्चों की छोटी इच्छाएँ,
मन के भीतर दब जाती हैं,
महंगाई की तेज़ धूप में,
खुशियाँ भी मुरझाती हैं।
फिर भी आशा जीवित है,
सूरज फिर से निकलेगा,
मेहनत, नीति और सद्भाव से,
हर संकट भी पिघलेगा।
आओ मिलकर प्रण करें हम,
न हिम्मत को हारेंगे,
महंगाई के इस अंधियारे में,
आशा के दीप उतारेंगे।
महंगाई केवल बढ़ते दाम नहीं,
यह आम जन के संघर्ष की कहानी है।

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

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