Tuesday, 14 July 2026

दान का धर्म - डॉ. वै. कस्तूरी बाई

 


दान का धर्म - डॉ. वै. कस्तूरी बाई 

चंदा यदि छल की चादर ओढ़े, तो वह धर्म नहीं, व्यापार बने,
 योगदान तभी पावन होता, जब निस्वार्थ भाव का द्वार खुले।
मदद वही, जो मौन करुणा बन, पीड़ित के आँसू पी जाए,
 भेंट वही, जो अहंकार त्यागकर, मानवता के चरण चढ़ जाए।
सेवा केवल कर्म नहीं है, यह जीवन का दिव्य विधान,
 जहाँ परहित ही परम आराध्य, वहीं बसता सच्चा भगवान।
पुण्य कभी सिक्कों से नहीं, निर्मल अंतःकरण से मिलता है,
 जो भूखे के अधरों पर मुस्कान धर दे, वही अमृतफल खिलता है।
पर जहाँ चोरी विश्वास चुराए, और घोटाला जनधन हर ले,
 वहाँ सभ्यता की आँखें रोतीं, न्याय स्वयं भी मौन ठहर ले।
धन का वैभव क्षणभंगुर होता, चरित्र सदा अमर कहलाता,
 लोभ की ज्वाला अंततः मानव का ही अस्तित्व जलाती जाती।
सहयोग वह दीपक है, जो अनेक हृदयों को आलोकित करता है,
 एकता का प्रत्येक संकल्प राष्ट्र का भाग्य प्रकाशित करता है।
दान न केवल वस्तु का अर्पण, अपितु मन का पावन विस्तार है,
 जहाँ समर्पण की गंगा बहती, वहीं सच्चा जीवन साकार है।
आओ ऐसा युग फिर रचें, जहाँ सत्य ही सर्वोच्च प्रमाण बने,
 न छल, न प्रपंच, न लोभ का विष, केवल मानवता का गान बने।
करुणा हो पूँजी, सेवा हो साधना, सहयोग हमारा सम्मान बने,
 और प्रत्येक दान, प्रत्येक योगदान, भारत की उज्ज्वल पहचान बने।

डॉ. वै. कस्तूरी बाई 
कर्नाटक

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