आत्मा / संजय वर्मा
मौत को देखा है सिसकते हुए
देखा है वटवृक्ष को निढाल होते हुए
जिसकी छत्र छाया में पनपे सभी
उनके लिए आँसू बह निकले
एक- एक आंसूं है उनकी यादों के
वो उनकी हर बातों को कह निकले
कुछ तो बात होगी उनमें जो
हर उम्मीद पर वो खरे उतरे
जब -जब भी परखा सबने
साहित्य के कवि का न रहना
परख की बेबसी अब सब के सामने
खड़ी है पोखरण की तरह
चाहत है आत्मा बन जाए वैसा रूप
ऊपर वाला क्या बना सकेगा
वैसा ही स्वरूप जो निर्णय ले सके
दुनिया को हिलाने का
समझ सके हर एक की बातें
शायद, एक स्वप्न था भारत का
मृत्यु भी तो अटल सत्य है
मगर आत्मा अजर अमर
वो है देश के आसपास।
संजय वर्मा "दृष्टि '
मनावर (धार )मप्र

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