Tuesday, 11 August 2026

पक्ष–विपक्ष का खेल

कविता : "पक्ष–विपक्ष का खेल" : डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

पक्ष कहे — "मैं दूध का धुला हूँ," विपक्ष बोले — "तू ही तो खुला हूँ!" दोनों की बातें सुन जनता हँसती, सच की नाव बीच भँवर में फँसती।
आरोपों की बरसात निराली, हर जुबाँ पर अपनी ही लाली। भ्रष्ट कहे वो उसको हरदम, खुद के दामन पर चुप है मातम।
बेशर्मी का ऐसा मेला, झूठ बना है सबसे चेला। नालायक का तमगा बाँटें, अपने दोष कभी न आँकें।
जिद्दी मन और दंभ का झंडा, बन गया राजनीति का धंधा। दादागिरी का ऐसा रंग, जनता रह जाए दंग-ही-दंग।
झुकना जिनको हार लगे है, अहंकार ही ताज जड़े है। संवादों के टूटे धागे, रिश्ते सारे पड़े अभागे।
गैरकानूनी चालें चलकर, फिर भी भाषण दें सँभलकर। सच की बातें कम ही होतीं, वादों की बस फसलें बोतीं।
जनता अब सब भाँप रही है, चुप रहकर भी नाप रही है। जिस दिन जागे जन-विश्वास, तब बदलेगा सारा इतिहास।
पक्ष हो या फिर हो विपक्ष, देश रहे सबसे अधिक। कुर्सी से ऊपर हो ईमान, तभी बनेगा भारत महान।

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