Thursday, 12 March 2026

जंग के मैदान में - अमृता अतुल पुरोहित

जंग के मैदान में - अमृता अतुल पुरोहित

जंग के मैदान में 
जिंदगी सिसक रही है. 

हँसी आशियाने की हर ईंट 
बदले की आग में धधक रही है. 

जंग ये ऐसी है कि जिसका कोई 
आदि न कोई अंत है. 

जिसे देखो वही  अब 
विनाश करने को स्वतंत्र है. 

वर्चस्व की लड़ाई में 
मानवता कहीं खो गई. 

सुनहरे सपने थे जिन आँखों में 
वो बेरंग हो गईं. 

बम और बारूद ने कैसा मंज़र 
यहाँ खड़ा किया. 

आर पार की इस लड़ाई ने 
इंसान की हस्ती को ही मिटा दिया. 

क्या खेत क्या खलिहान 
फ़ूलों की क्यारियाँ भी छिन गईं. 

छिन गई है हँसी ठिठोली 
नन्ही किलकारियाँ भी छिन गईं. 

छिड़ी है जब भी कोई जंग तो 
इंसानियत खोती है. 

खण्डहर बनते हैं घर और 
वो कुदरत भी रोती है. 

लगे जैसे कि दुनिया बस जंग के 
आगोश में सिमट रही. 

 जिंदगी जीने की हँसी चाहतें 
 मिसाइलों पर ठिठक रहीं. 

हथियारों की अंधी होड़ बस 
तबाही लेकर आती है. 

विजय पराजय की ये लड़ाई 
बस ग़म ही देकर जाती है. 

क्या होता है  जंग  का अंजाम 
ओ दुनिया वालों देख लो. 

इंसानियत खत्म होने से पहले 
इंसान बनना सीख लो.

मेरा नाम 
अमृता अतुल पुरोहित 
Gujarat 

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