दर्दे दिल जिगर का अफसाना कैसे कहूं - उमेश नाग
दर्दे दिल जिगर का अफसाना कैसे कहूं,
वो रूठ जातें हैं हम
बहुत सहम जाते हैं।
वो जब जब नजदीक
होते हैं शिकायतें दूर हो
जातीं हैं,
मासूम दिल को दवा मिल
जातीं हैं।
रोग भी तुम ही हो जो नही
आतें मिलने,
जो तुम आ जाओ मिलनें
प्रणय की दवा हो जाऐं।
मेरे दर्दे दिल की हर औषधि
तुम ही हो,
लाख ही बचना चाहो तुम,
बच न पाओगे तुम मेरे दर्द
दिल से।
जो जख्म दिए हैं तुमने मुझे
दवा उसकी भी तुम हों।
तुम्हारा हमनवां मैं ही हूं,
कितना भी प्रयत्न करों,
दिल में तो मैं ही मैं हूं।
दर्द भी मैं ही हूं,
दवा भी मैं ही हूं तुम्हारा।
तन्हा न समझना खुद को
तुम,
तेरी मंजिल भी मैं ही हूं,
और रास्ता भी मैं ही हूं।
कांरवा जो चलें तेरे साथ,
वो भी मैं ही हूं,
तुम्हारे जख्मों के दर्द भी
मैं ही हूं दवा भी मैं ही हूं।
श्रीमती उमेश नाग जयपुर राजस्थान
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