बलि - डा, तरूण राय कागा
अंधविश्वास के वशीभूत होकर पशूओं की चढती बलि,
आत्मविश्वास के वशीभूत हत्या पशूओं की चढ़ती बली।
एक वर्ग करता ह़लाल दूसरा झट-पट झटका,
पीते मदिरा खाते मांस चाव से चढती बलि।
कोई कुर्बानी करता खैरात कोई मन्नत मुराद चढ़ावा,
बांटी जाती प्रसादी बकरा भैंसा की चढ़ती बलि।
अमुक आस्था स्थलों पर बंटता प्रसाद गोश्त का,
बेजुबान कटते जीव धड़ा-धड़ बेधड़क चढ़ती बलि।
अब सभ्यता संस्कृति में मची हड़कंप खलबली कागा,
रोक-थाम होने लगी फिर भी चढ़ती बलि।
क़लमकार
डा, तरूण राय कागा
पूर्व विधायक
कवि साहित्यकार
राजस्थान
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