Friday, 22 May 2026

महँगाई का महायुद्ध - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai


 महँगाई का महायुद्ध - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai

पेट्रोल की धधकती ज्वाला से पथ भी तपने लगे,
 डीजल के बढ़ते दामों से रथ थमने लगे।
 तेल की प्रत्येक बूँद अब अमृत-सी लगती है,
 जनता की व्यथा निरंतर आकाश छूती है।
सोना अब स्वप्न समान महलों में बसता है,
 चाँदी भी निर्धन के हाथों से खिसकता है।
 देश का श्रमिक मौन खड़ा आहें भरता है,
 विदेश का बाजार यहाँ निर्णय करता है।
यात्रा अब सरल नहीं, कठिन तपस्या बनती,
 गाँवों की पगडंडी भी चिंता से भरती।
 रथ, मोटर, रेल सभी बोझिल हो उठते हैं,
 दामों के प्रहारों से जन रो उठते हैं।
माँ की रसोई में धुआँ प्रश्न बन जाता,
 बच्चों का निष्छल हँसना भी क्षीण हो जाता।
 कृषक के श्रम का मूल्य कहीं खो जाता है,
 मजदूर का पसीना व्यर्थ बह जाता है।
सरकार! सुनो जन-मन की यह पीड़ित वाणी,
 केवल आश्वासन से मिटती नहीं परेशानी।
 बचाओ उस मानव को जो टूट रहा भीतर,
 जिसके सपनों पर बैठा है संकट घनघोर।
देश तभी उन्नत होगा जब जन सुख पाएँगे,
 भूखे अधरों पर फिर मधुर गीत आएँगे।
 तेल, पेट्रोल, डीजल जब संयम में आएँगे,
 तब भारत के स्वर्णिम दिन फिर मुस्काएँगे।
सोना-चाँदी से बढ़कर जन का सम्मान रहे,
 हर निर्धन के मुख पर भी मधुर मुस्कान रहे।
 विदेशों से प्रतिस्पर्धा में देश बढ़े आगे,
 किन्तु मानवता का दीप सदा जगमग जागे।
डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी नई 
बेंगलूरु
कर्नाटक 
Dr. Pro. Y. Kasturi Bai 
Bengaluru 
Karnataka

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