लोकतंत्र का मौन विलाप - Dr. Y. Kasturi Bai
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धरना अब तप नहीं, स्वार्थों का अभिषिक्त अनुष्ठान है; प्रदर्शन जनवेदना का नहीं, महत्वाकांक्षाओं का महागान है। विरोध के वज्रनिनाद में विवेक का शंख मौन पड़ा है, और भूख-हड़ताल की तपश्चर्या पर विलासिता का उपहास खड़ा है। प्रदर्शनकारी जनसेवक कम, जनमत के कुशल व्यापारी अधिक प्रतीत होते हैं; बहिष्कार के बाण चलाकर अपने ही समाज की जड़ों को विदीर्ण करते हैं।
माँगों की अंतहीन सूची आकाश छूती है, पर कर्तव्यों की पावन पंक्ति धूल में पड़ी सिसकती रहती है। समझौतों की मेज़ पर सिद्धांत नीलाम होते हैं, और कल के कट्टर प्रतिद्वंद्वी आज परस्पर आलिंगनबद्ध दिखाई देते हैं। बंद की घोषणा होते ही श्रमिक की हथेली सूनी हो जाती है, किसान की आशा मुरझा जाती है, विद्यार्थी का स्वप्न ठिठक जाता है, रोगी की साँस प्रतीक्षा में अटक जाती है; किंतु मंचों पर विजयोल्लास के उद्घोष गूँजते रहते हैं।
नारों का प्रचंड कोलाहल सत्य का प्रमाण नहीं होता; भीड़ का आकार न्याय का आधार नहीं बनता। क्रांति का तेज़ पथराव से नहीं, चरित्र के प्रकाश से प्रकाशित होता है। अधिकारों का मुकुट तभी शोभा देता है, जब कर्तव्य उसका सिंहासन बने; अन्यथा लोकतंत्र भीड़तंत्र का बंधक बनकर रह जाता है।
आओ, विरोध को विद्वेष नहीं, विवेक का व्रत बनाएँ; संघर्ष को विनाश नहीं, संवाद का सेतु बनाएँ। धरना अंतिम उपाय हो, प्रथम संस्कार नहीं; प्रदर्शन जनकल्याण का दीप बने, जनजीवन का अभिशाप नहीं। इतिहास उन्हीं को प्रणाम करता है, जो शोर नहीं, समाधान रचते हैं; क्योंकि राष्ट्र नारों से नहीं, श्रम, सत्य, संयम और उत्तरदायित्व से महान बनता है।
Dr. Y. Kasturi Bai
Karnataka

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