सफलता की दौड़ में पीछे छूटती ज़िन्दगी
“अन्या, आज स्कूल में क्या हुआ?” माँ ने मोबाइल पर रील बदलते हुए पूछा।“मैडम ने कहा था कि अपने माता-पिता के बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखो,” अन्या ने धीमे स्वर में कहा।पिता लैपटॉप पर काम करते हुए बोले, “अच्छा! सुनाओ, क्या लिखा?”अन्या ने कॉपी खोली और पढ़ा—“काश! पापा लैपटॉप से नज़र उठाकर मेरी बातें सुन पाते और माँ मोबाइल से ज़्यादा मुझे देख पाती।”कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।आज के माता-पिता बच्चों को हर सुविधा देकर उन्हें सफल और कामयाब बनाना चाहते हैं। लेकिन बेहतर भविष्यबनाने की कोशिश में वे कई बार उनका वर्तमान देखना भूल जाते हैं। पिता काम में व्यस्त रहते हैं और माँ कुछपल आराम पाने के लिए मोबाइल की दुनिया में खो जाती है। बच्चा पास होकर भी अकेला और निराश महसूसकरता है।बच्चों को केवल खिलौने, महँगे कपड़े या बड़ा विद्यालय नहीं चाहिए। उन्हें माता-पिता का समय, स्नेह और ध्यानचाहिए। वे चाहते हैं कि कोई उनकी छोटी-सी बात सुने और उनके मन के हालात समझे।ज़िन्दगी की सबसे बड़ी सीख यही है कि रिश्तों को सँभाले बिना प्राप्त सफलता अधूरी होती है। मुश्किलपरिस्थितियों से लड़ना आवश्यक है, पर अपनों की भावनाओं को अनदेखा करना उचित नहीं।उस शाम पिता ने लैपटॉप बंद किया, माँ ने मोबाइल एक ओर रखा और दोनों अन्या के पास बैठ गए। पहली बारउन्होंने केवल उसकी बातें नहीं सुनीं, बल्कि उसके मन का अकेलापन भी समझा।~ डॉ. रीटा अरोड़ाहरियाणा

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