।। मन निर्मल ज्यों गंगाजल।।
बने मन निर्मल ज्यों गंगाजल,
हृदय दिव्य तीर्थ सा हो पावन।
कहे कवि रुप बोल अनमोल,
हमीं में राम बसे हमीं में रावण।।
भक्ति हो मीरा रैदास सम,
प्रेम ज्यों ब्रजरानी राधा।
मित्रता ज्यों कृष्ण सुदामा,
एक पान बंटे आधा आधा।।
मन कांवड़ में भर ले जल,
शुद्ध हृदय भाव निश्छल।
सुंदर तन होना मलिन एक दिन,
भाव शुद्धता स्वर्ण कमल।।
रुप कहे अनमोल वचन,
बनो शबरी सूरदास सम।
भक्ति का फैले आलोक ऐसा,
मिटे अज्ञान अंधकार तम।।
जीवन में हो सदाचार औ,
सत्य,करुणा,दया, धर्म।
करे सदा जग जयगान ,
रुप!देशहित हेतु हो कर्म।।
रचना: रुपेश कुमार मिश्र
बिहार
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