Sunday, 23 August 2026

शान्ति / नेहा बागड़ी

शान्ति / नेहा बागड़ी

शान्ति का अर्थ केवल युद्धविराम या  युद्ध का न होना नहीं है।अपितु  ये  वह अवस्था है जहाँ मन में कोलाहल नहीं, दिल में बैर नहीं और समाज में भय नहीं। यह एक ऐसी पूँजी है जिसे न खरीदा जा सकता है, न छीना जा सकता है — सिर्फ महसूस किया जा सकता है। यह व्यक्तिगत चेतना से शुरू होकर वैश्विक स्तर तक पहुँचती है। एक शांत मन और समाज ही विकास, करुणा और सच्चे मानव कल्याण का आधार बन सकते हैं
इसे आंतरिक और बाह्य रूप में व्यक्त कर सकते है। जब हमारा मन ईर्ष्या, लालच और चिंता से मुक्त होता है, तब सच्ची शान्ति मिलती है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं — “अशांतस्य कुतः सुखम्” 
अशांत व्यक्ति को सुख कहाँ। अर्थात् जो व्यक्ति अशांत है (जिसका मन स्थिर नहीं है), उसे सुख कहाँ से मिल सकता है?" 
अशान्ति का बीज अक्सर अहंकार, लोभ और अज्ञान में छिपा होता है। 'मैं सही, तू गलत' की ज़िद, 'मेरा ज्यादा, तेरा कम' की होड़, और 'सुनूंगा नहीं, सिर्फ सुनाऊँगा' का रवैया - ये तीनों मिलकर शान्ति की दीवार में दरार डाल देते हैं। आजकल चारों तरफ  फैलती नफरत, अफवाहें और ध्रुवीकरण आज की सबसे बड़ी चुनौती हैं।
तनाव, गुस्सा, नफरत — ये सब बीमारियों की जड़ हैं। शांत मन शरीर को भी निरोग रखता है।  रिश्तों की डोर: परिवार, दोस्ती, पड़ोस — सब शान्ति के बिना बिखर जाते हैं। आने वाली पीढ़ी के लिए: हम जैसा माहौल देंगे, बच्चे वैसा ही सीखेंगे। अगर आज हम शान्ति चुनेंगे, तो कल की दुनिया युद्ध नहीं, संवाद चुनेगी।  जैसे एक दीये से हजारों दीये जलते हैं, वैसे ही एक शांत मन हजारों दिलों को सुकून दे सकता है।

नेहा बागड़ी ,भिवानी (हरियाणा)

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