स्वाधीनता का स्वाभिमान / डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई
पंद्रह अगस्त की पावन बेला,
लेकर आई स्वतंत्र प्रभात,
वीरों के त्याग, तपस्या से,
मिली हमें आज़ादी की सौगात।
नमन उन अमर बलिदानों को,
जिन्होंने जीवन वार दिया,
भारत-माता की मुक्ति हेतु,
हँसकर अपना संसार दिया।
यह स्वतंत्रता केवल उत्सव नहीं,
यह त्यागों का अमर निशान,
यह स्वाभिमान की उज्ज्वल ज्योति,
यह भारत की महान पहचान।
कितने वीरों ने कष्ट सहे,
कितनों ने कारावास सहा,
कितनों ने मातृभूमि के हित,
अपना सर्वस्व अर्पित किया।
जय जवान! जय किसान!
इनसे भारत की शान महान।
सीमा पर प्रहरी राष्ट्ररक्षक,
खेतों में अन्न उगाता किसान।
दोनों के श्रम और त्याग से,
गौरवमय है हिंदुस्तान।
स्वराज हमारा पावन संकल्प,
स्वाधीनता हमारा अभिमान,
एकता, अखंडता, सत्य, अहिंसा—
भारत की यही महान पहचान।
न भाषा बाँटे, न जाति बाँटे,
न कोई धर्म बने व्यवधान,
सब मिलकर भारत को सँवारें,
सबके हृदय में हो हिंदुस्तान।
युवा बढ़ें नव उत्साह लिए,
ज्ञान बने उनका अस्त्र महान,
श्रम की पूजा, सत्य का पथ हो,
राष्ट्रसेवा बने जीवन-गान।
तिरंगे की आन न झुकने देंगे,
भारत का मान बढ़ाएँगे,
वीरों के पावन बलिदानों की
हर पल लाज निभाएँगे।
आओ आज शपथ यह लें—
देश प्रथम, फिर अपना मान;
तन-मन-धन सब अर्पित होगा,
भारत माँ पर जीवन-कुर्बान।
स्वतंत्रता अमर रहे सदा,
अमर रहे वीरों का बलिदान।
जय हिंद! जय भारत! ! जय हो हिंदुस्तान!
डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई
बेंगलूरु
कर्नाटक
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