समन्वय का सेतु - डॉ वै कस्तूरी बाई
जब टकराते हैं स्वार्थ, अहं और अभिमान के पर्वत,
तब संवाद की धारा ही बनती है जीवन का पथ।
समझौता कोई दुर्बलता नहीं, विवेक का उत्सव है,
जो झुककर भी अडिग रहे, वही सच्चा गौरव है।
बिचौलिया यदि निष्कलुष हो, न्याय स्वयं मुस्काता है,
वह टूटी हुई आशाओं को फिर से जोड़ जाता है।
अनुबंध केवल शब्द नहीं, विश्वासों का आधार है,
जिस पर टिका हुआ मानव-सम्बन्धों का संसार है।
संधि की शीतल छाया में वैराग्नि शांत हो जाती,
कटु स्मृतियों की काली रात प्रभात में बदल जाती।
सुलह का मधुर संदेश हृदयों को निकट बुलाता,
द्वेष और दूरी के वन में प्रेम-सुमन खिलाता।
मेल-मिलाप की सरिता जब मन-आँगन में बहती है,
सूखी संवेदनाओं की धरती फिर हरित रहती है।
समाधान का दीप जहाँ भी धैर्य सहित जलता है,
विवादों का घना कुहासा पलभर में गलता है।
बार्गनिंग भी जीवन की व्यवहार-कला कहलाती,
जहाँ हित और मर्यादा मिलकर नई दिशा दिखलाती।
मध्यस्थता का धर्म सदा निष्पक्ष भाव अपनाना,
बिखरे हुए विश्वासों को धैर्यपूर्वक पुनः सजाना।
तोड़-जोड़ की नीति अगर केवल स्वार्थ जगाती है,
तो संबंधों की नींव स्वयं ही दरक-सी जाती है।
रियायत जब करुणा बनकर मानवता से मिलती है,
कठोर शिलाओं में भी तब कोमलता खिलती है।
इतिहास सदा यह कहता है— युद्धों ने घाव दिए,
संवादों ने मानव को नव जीवन के भाव दिए।
इसलिए जग में श्रेष्ठ वही, जो मन का द्वार खोलता,
वैर-विभाजन की दीवारें तोड़, प्रेम का सेतु बोलता।
समझौता, संधि, सुलह, समाधान का यही विधान—
मानवता की विजय वहीं, जहाँ जीवित हो सम्मान।
डॉ वै कस्तूरी बाई

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