समाधान - ललित कुमार शर्मा
राह में बाधाएँ बहुत हैं
चलो कोई समाधान ढूंढें
छोड़ अपनी ये आवारगी
चलो कोई एक अरमान ढूंढें
आज जिस तरफ भी देखो
बिखरी पड़ी इंसानियत है
छोड़कर हम हैवानियत को
चलो कोई नेक इंसान ढूंढें
लूटता फिर रहा है जो
माँ बहनों की अज़मियत को
आज दें उसको सज़ा हम
चलो सब वो हैवान ढूंढें
हर कोई है परेशान कितना
देखकर मेरी हैसियत को
रहें जहाँ हम सब मिलकर
चलो वो इक जहान ढूंढें
खो रहे घर आज सबके
हम बड़ों की अहमियत को
हो जिस घर में दादी नानी
चलो वो इक मकान ढूंढें
सोए हुए सब रिश्ते हैं सारे
कोई न पूछे यहाँ खैरियत को
ये दुनियादारी जो ना समझे
चलो ऐसा इक नादान ढूंढ़े
राह में बाधाएँ बहुत हैं
चलो कोई समाधान ढूंढें
चलो कोई समाधान ढूंढें
*स्वरचित एवं मौलिक रचना
ललित कुमार शर्मा
नई दिल्ली

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