लोकतंत्र की लौ - डॉ. वाई. कस्तूरी बाई
सत्याग्रह की ज्योति जली, अंधियारा हार गया,
सत्य के आगे झूठ स्वयं, पल में लाचार गया।
अनशन की तपती साँसों ने, पत्थर भी पिघलाए,
भूख हड़तालों ने जग को, मानव धर्म सिखाए।
धरना केवल बैठना नहीं, जनमन की हुंकार है,
अन्यायों के सम्मुख उठता, साहस का उद्घोष अपार है।
जलसमाधि की मौन व्यथा, लहरों ने दोहराई,
बलिदानों की अमर कहानी, युग-युग तक गहराई।
जब सरकारें भूल गईं, सेवा का पावन धर्म,
जबरदस्ती ने ओढ़ लिया, शासन का काला कर्म।
जुल्म सदा कुछ पल ठहरा, फिर मिट्टी में मिल जाता,
जन-जन का जागृत साहस, हर अत्याचारी हराता।
लोकतंत्र का अर्थ नहीं, केवल शासन चलाना,
हर नागरिक के मन का भी, सम्मान सदा निभाना।
जहाँ प्रश्नों पर ताले हों, वहाँ सन्नाटा रोता,
जहाँ संवादों का दीप जले, वहीं सवेरा होता।
भूतकाल यह कहता है—
सत्य कभी झुकता नहीं।
वर्तमान समझाता है—
अहंकार टिकता नहीं।
भविष्य पुकार रहा हमको—
मिलकर राह बनानी है,
कटुता की हर दीवारों पर,
प्रेम-ज्योति जलानी है।
संघर्षों में मर्यादा हो,
वाणी में मधुर विचार रहें,
विरोधों में भी राष्ट्रप्रेम के,
अमर, अटल आधार रहें।
सत्याग्रह फिर सत्य रहे,
अनशन अंतिम उपाय बने,
जुल्म स्वयं ही समाप्त हो,
जन-जन का विश्वास तने।
सरकार बने जनसेवक,
जनता उसका मान बने,
भारत का लोकतंत्र सदा,
विश्वगगन की शान बने।
डॉ. वाई . कस्तूरी बाई
कर्नाटक

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