Monday, 28 September 2026

ऑनलाइन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

ऑनलाइन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
 
आज ऑनलाइन का बोलबाला है।
ऑनलाइन बड़ा निराला है।
जब कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या व्यक्ति किसी कंप्यूटर नेटवर्क या इंटरनेट से जुड़ा होता है, वह ऑनलाइन कहलाता है। 
दुनिया के कोने-कोने की जानकारी, ऑनलाइन से पाया जाता है।

आँख खुलती नहीं, हमारा हाथ जाता है मोबाइल पर।
अपनी फोटो पर लाइक और कमेंट देख, मुस्कान आता है चेहरे पर।
हम आज ऑनलाइन की दुनिया में जी रहे हैं।
ऑनलाइन खरीदारी, ऑनलाइन व्यापार, ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
अब दफ्तर जाने की जरूरत नहीं, घर से काम हो जाता है।
मनुष्य अपनी 
सुविधानुसार कार्य करता, समय भी बच जाता है।
बीमार व्यक्ति, ऑनलाइन परामर्श पा जाता है।
कई चिकित्सकों की सलाह, वह ले पाता है।
हर सुविधा मनुष्य, घर बैठे पा रहा।
ऑनलाइन से मानव उन्नति कर रहा, सफलता की सीढ़ी चढ़ रहा।
ऑनलाइन छात्र पढ़ाई करते, होते हैं सफल।
छात्र प्रगति करते, बढ़ता उनका मनोबल। 
किसी भी चीज की अति, बड़ी बुरी होती है।
ऑनलाइन के प्रयोग में, कुछ सावधानियां रखनी जरूरी है।
तुरंत विश्वास न करें, पूरी छानबीन करें‌।
विज्ञापनों पर न जाए, 
खरीदने के पहले जांच-पड़ताल करें।
ज्यादा ऑनलाइन रहना, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। 
आँख पर असर पड़ता, सर दर्द, गर्दन, पीठ के दर्द का कारण है।
ऑनलाइन ठगी और धोखा घड़ी के शिकार हम होते हैं। 
हम ऑनलाइन की दुनिया में इतना खो जाते हैं, व्यक्तिगत रिश्ते कमजोर होते हैं।
बार-बार हम मोबाइल देखते, एकाग्रता हमारी कम होती।
गाड़ी चलाते समय मोबाइल का उपयोग करने से दुर्घटना होती।
ऑनलाइन पर ज्यादा निर्भर न रहे, आमने-सामने होकर बातें करें। 
कभी-कभी चिट्ठी लिखे, केवल मोबाइल पर मैसेज न करें।
मोबाइल के दोस्त काम कम आते हैं, अपने रिश्तेदार ज्यादा।
व्हाट्सएप, फेसबुक से ज्यादा अपना रिश्ता हमें संभालना है, खुद से करो यह वादा।
कभी-कभी विज्ञापन में जो दिखता है, वह सही नहीं होता।
जब सामान घर आता कभी-कभी वह विज्ञापन जैसा नहीं होता।
ऑनलाइन से पढ़ाई करो, अपना ज्ञान बढ़ाओ।
अच्छी बातें सीखो, 
समाज में नाम कमाओ।
ऑनलाइन रहें, मगर आँख मूँद कर विश्वास न करें।
अपना विवेक का उपयोग करें, तभी पांव आगे धरें।
 
डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
West Bangal 

आनलाइन - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 

आनलाइन - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 

आनलाइन सुविधाओं से
हर सुविधाएं मिल जाती है ।
पैसों की बैंकिंग सेवाओं का
लेन देन आनलाइन होता है ।

आनलाइन शापिंग होती है
पीज़ा वरगर भी आ जाता है ।
खाना जो भी खाना हो सब
आनलाइन ही आ जाता है ।

फेसबुक वाट्सएप गूगल हो
फायदा नुकसान तो होता है ।
चलाने वाले के ऊपर है
क्या उससे हासिल करता है ।

सोशल मीडिया की तकनीक से
घर बैठे ही बहुत हासिल होता है ।
वाट्सएप के माध्यम से सभी को
आनलाइन सब मिल जाता है ।

सारा सच है मोबाइल के माध्यम
फेसबुक वाट्सएप गूगल से जुड़ते हैं।
यूट्यूब इंटरनेट से भी जुड़कर
मोबाइल से हासिल कर सकते हैं ।

साहित्य के क्षेत्र में साहित्यकार
आनलाइन कवि सम्मेलन करते हैं ।
आडियो वीडियो टाइप कविता
फेसबुक वाट्सएप में भेजते हैं ।

3000 आनलाइन कवि सम्मेलनों में 
10000 सम्मान पत्र पाये है ।
मैंने तो आनलाइन सम्मेलनों में 
समय के साथ सम्मान पाते हैं।

सारा सच है आनलाइन सभी
आज कल काम आसान होते हैं ।
आनलाइन सम्मान आ जाते
ऐसे कवियों को फायदा होते हैं ।

आनलाइन मेरे सम्मान आते थे 
साहित्य साथी मजाक उड़ाते थे।
मुक्त होगी जब खुद बने  तब 
बात समझ लो पाये था।

इंटरनेट के माध्यम से लेन देन
काम सभी मोबाइल से होते हैं।
बैंकों में पैसे जमा हो जाते हैं
बिजली के बिल भी भरे जाते हैं।

आनलाइन शापिंग भी होती है
कहीं से भी कोई सामान आ जाता है।
सारा सच आने जाने की जरूरी नही 
आनलाइन पैसा भी चला जाता है ।

गलत काम जो करते हैं
वो लोगों को झूठा फसाते हैं ।
दो नंबर का काम भी करते हैं
नुक़सान सभी को पहुंचाते हैं ।

  महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
   जबलपुर म प्र

आनलाइन - काव्य शिरोमणि वरिष्ठ कवि

आनलाइन - काव्य शिरोमणि वरिष्ठ कवि
  *****
ऑनलाइन की दुनिया निराली, 
दूरियां लगती छोटी सी प्याली ।

घर बैठे संसार से जुड़ जाते, 
पल में संदेश कहीं पहुंचाते ।

ज्ञान का सागर  सामने आता, 
हर प्रश्न का तुरंत मिल जाता। 

पढ़ना हो  या  कुछ भी सिखलाना, 
ऑनलाइन ने सरल किया जमाना। 

 देश - विदेश से खबरें है मिलती, 
 नई-नई जानकारियाँ से खिलती। 

 व्यापार  हो  या हो सुंदर पढ़ाई, 
 ऑनलाइन ने तुरंत राह दिखाई।

 पर  इतना  भी  ध्यान  रहे भाई, 
 आभासी दुनिया सच नहीं भाई। 

 रिश्तों  की  गर्माहट  मत  खोना, 
 अपनों से संवाद कभी मत रोना। 

 मोबाइल को मालिक मत बनाना, 
 समय को यूँ  ही व्यर्थ न गँवाना।

तकनीक बने हैं जीवन की साथी, 
तभी बनेगी राह सुखद की साथी। 

 ऑनलाइन से ज्ञान को बढ़ाएं,
 पर  जीवन  में मानवता लाएं। 

 विज्ञान  तभी  सुंदर कहलाए,
 जब इंसान को  इंसान बनाए।

 ऑनलाइन जग से जुड़े जरूर,
 पर  अपनेपन  से नहीं  हो दूर।

 पर   उपकार   कुशल   है  मेरे, 
 कितना समझाऊं औरों को तेरे।

 ना  जाने  संवाद  कहां  से आ जाए, 
 हो सकता है,सुखद संवाद आ जाए।

 कवी “सुरेश कंठ “ का  यही  है कहना, 
 हर समय मोबाइल  को पास  ही रखना।
                जयहिंद 
                 *****
 रचयिता :- काव्य शिरोमणि वरिष्ठ कवि
 “सुरेश कंठ “ अररिया बिहार। 
        मो० 99312 30828


नाम - काव्य शिरोमणि 
     वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ,
    बथनाहा,अररिया बिहार

युद्ध नहीं बस अब विश्व शांति चाहिए - ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

 युद्ध नहीं बस अब विश्व शांति चाहिए - ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

(अंतर्राष्ट्रीय विश्व शांति दिवस-विशेष)

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

चार छः देशों में अहं आगे,कैसी ये मची तबाही है।
शहरों की सुंदरता बिगड़ी,ये खंडहर ही गवाही है।।

जहाँ भी देखें वहीं मची है,चारों तरफ ये तबाही है।
अहं और दादागिरी से हो,रही यह भारी तबाही है।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

जानमाल व्यवसाय गृहस्थी,परिवारों की बर्बादी है।
स्त्री पुरुष बूढ़े बच्चे जवाँ,से खाली ये आबादी है।।

अच्छे खासे मकां इमारत,की रोज होती बर्बादी है।
बस केवल खूनी एक तमाशा,शहनाई न शादी है।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

मानवता भी कराह रही है,ऐसा ये अहं है टकराया।
बड़े-बड़े शहरों को इसी,युद्ध ने खंडहर है बनाया।।

चाहे हो ईरान-अमेरिका-इजराइल,खौफ है छाया।
या फिर हो रूस-यूक्रेन,चार वर्षों से थम न पाया।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

सेना सैनिक एवं नागरिक,जंग लड़ रहे हैं यूक्रेन में।
रूसी फौजें कहीं ना कहीं,कहर बरपाते यूक्रेन में।।

इजराइल-अमेरिका मिल,लड़ रहा अकेले ईरान में।
कोई नहीं जंग में पीछे है,सभी डटे युद्ध मैदान में।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

तोप टैंक मिसाइल चापर,फाइटर प्लेन गिराते बम।
रूस-यूक्रेन दोनों अड़े-खड़े,एक दूजे से न हैं कम।।

न ही अमेरिका-इजराइल,और ना ही ईरान है कम।
एक दूजे पर बरस रहा है,रुक-रुक कर गोला बम।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।

हर रूसी एक्शन का देता,यूक्रेनी लड़ाकू हैं जवाब।
आज तक टीवी न्यूज़ के,युद्ध कवरेज का जनाब।।

देख रहा या जो देखा था,वही पंक्तिबद्ध सब साब।
कुछ गलत लिखा है यदि,तो करना मुझको माफ।।

युद्ध नहीं दुनिया-भारत को,ये विश्व शांति चाहिए।
काफी हो चुका बड़ देशों में,आगे रुकना चाहिए।।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर,सब को शांति चाहिए।
किसी भी कीमत पर देशों,में अशांति ना चाहिए।।


सर्वाधिकार सुरक्षित ©®

रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक समाजसेवी)

टेलीपैथी का चमत्कार (मन से मन के तार) - जौली अंकल

टेलीपैथी का चमत्कार  (मन से मन के तार)

कल्पना कीजिए कि आप किसी सुनसान रेगिस्तान या घने जंगल में भटक गए हैं। मोबाइल की बैटरी खत्म हो चुकी है और नेटवर्क गायब हैं। ऐसे में अगर आप बिना फोन या बिना किसी साधन के सिर्फ अपने दिमाग से अपने दोस्त को यह संदेश भेज सकें कि भाई पिज्जा लेकर तुरंत यहाँ पहुँच जाओ और वह आपकी बात सुन ले। सुनने में यह थोड़ा फिल्मी और मजेदार जरूर लगता है, लेकिन बिना किसी साधन जैसे बोलना लिखना या इशारे के एक मन से दूसरे मन तक अपने विचारों और भावनाओं को पहुँचाने की इसी कला को टेलीपैथी या दूरानुभूति कहते हैं। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1882 में फ्रेडरिक डब्ल्यू एच मायर्स ने किया था। जैसे टेली शब्द से टेलीविजन दूर की तस्वीरें दिखाता है और टेलीफोन दूर की आवाज सुनाता है, ठीक वैसे ही हमारा दिमाग भी एक कंप्यूटर की तरह दूर बैठे इंसान के विचारों को पकड़ सकता है। महाभारत काल में संजय के पास भी तो यही दिव्य दृष्टि थी, जिससे उन्होंने घर बैठे धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध का पूरा हाल सुना दिया था।

टेलीपैथी किस प्रकार कार्य करती है और इसका ढांचा क्या है, इसे समझने के लिए हमें रेडियो का उदाहरण लेना होगा। टेलीपैथी के मुख्य रूप से दो सबसे जरूरी हिस्से होते हैं। पहला ‘सेंडर’ यानी विचार भेजने वाला और दूसरा ‘रिसीवर’ यानी विचार पाने वाला। जब सेंडर अपने मन में कोई साफ विचार बनाता है, तो उसका अवचेतन मन विचार तरंगें बाहर निकालता है। यदि रिसीवर का मन भी शांत और एकाग्र हो, तो वह इन तरंगों को तुरंत पकड़ लेता है। उदाहरण के लिए कई बार आप अपनी मम्मी के पास जाने ही वाले होते हैं कि वे अचानक रसोई से आवाज देती हैं कि जरा बाज़ार से धनिया ले आना। या आप अपने किसी पुराने दोस्त को याद कर ही रहे होते हैं कि अचानक उसका फोन आ जाता है। यह कोई टोना टोटका नहीं बल्कि हमारे अवचेतन मन का वही अदृश्य नेटवर्क है जो अक्सर अनजाने में आपस में जुड़ जाता है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या टेलीपैथी का कोई वैज्ञानिक अस्तित्व है और इसके क्या फायदे हैं। अगर हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला के नियमों पर टेलीपैथी को पूरी तरह से साबित नहीं मानता और इसे परामनोविज्ञान का विषय कहता है। हालांकि विज्ञान यह जरूर मानता है कि इंसानी दिमाग में अद्भुत ऊर्जा होती है। टेलीपैथी के फायदों की बात करें तो यह हमारी एकाग्रता और छठवीं इंद्री को बहुत मजबूती देती है। इसका सबसे बड़ा फायदा मुश्किल स्थितियों में हो सकता है जहाँ कोई तकनीक काम न करे। इसके अलावा यह इंसानी रिश्तों को गहरा बनाती है। जैसे कई बार बिना कुछ कहे ही आपकी बेस्ट फ्रेंड समझ जाती है कि आपका समोसा खाने का मूड है या ब्रेकअप का दुख। धर्म और अध्यात्म में इसे ध्यान की आखिरी सीमा माना गया है, जहाँ मन की शांति से आप किसी भी दूर बैठे व्यक्ति की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं।

कई लोग पूछते हैं कि क्या टेलीपैथी खुद से सीखी जा सकती है और इसे सीखने का तरीका क्या है। जी हाँ, इसे रोज के अभ्यास और मन के अनुशासन से सीखा जा सकता है। टेलीपैथी का अभ्यास करने के लिए सबसे पहले किसी शांत कमरे में बैठें, गहरी सांसें लें और अपने दिमाग से दिनभर की फालतू चिंताओं को बाहर निकाल दें। इसके बाद अपनी आंखें बंद करके अपने किसी करीबी दोस्त या घर के सदस्य का एकदम साफ चेहरा दिमाग में बनाए। अब अपने संदेश को बिल्कुल छोटा, सरल और साफ रखें, जैसे मुझे याद करो या मुझे तुरंत कॉल करो। इस संदेश को अपने मन में दोहराएं और सोचें कि रोशनी की एक किरण आपके दिमाग से निकलकर सीधे आपके दोस्त के दिमाग में जा रही है। संदेश भेजने के बाद सब्र रखें और पूरा विश्वास बनाए रखें। शुरुआत में अपने किसी प्यारे दोस्त के साथ इसका रोज 10 मिनट अभ्यास करें। हो सकता है कि पहले दिन वह आपको सिर्फ मैसेज में पूछे कि और भाई क्या हाल हैं, लेकिन यही आपके दिमाग के बिना तार वाले नेटवर्क की पहली जीत होगी।

आज का मानव ज्ञान और तकनीक के इस दौर में बहुत आगे बढ़ चुका है। हम चांद और मंगल तक पहुँच गए हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि इतना ज्ञान होने के बाद भी इंसान की सोच कभी-कभी संकीर्ण, हिंसक और मूर्ख बनी रहती है। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से वीडियो कॉल पर तो बात कर लेते हैं, लेकिन पास बैठे इंसान के दिल का दर्द नहीं समझ पाते। टेलीपैथी हमें सिखाती है कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारे भीतर ही छिपी है। अगर हम अपने अवचेतन मन की गहराई को समझ लें और अपने मन को शांत करना सीख जाए, तो हमें किसी इंटरनेट नेटवर्क की जरूरत नहीं पड़ेगी। टेलीपैथी केवल एक रहस्यमयी विद्या नहीं बल्कि मन की शुद्धता, एकाग्रता और आपसी जुड़ाव का एक खूबसूरत जरिया है। तो जौली अंकल की बात मान कर बिना देर किये ही अपनी आंखें बंद कीजिए, अपने दिमाग का नेटवर्क चालू कीजिए और अपने किसी खास दोस्त को मन ही मन संदेश भेजकर देखिए कि आपके दिल की बात उसके मन तक पहुँचती है या नहीं।
- जौली अंकल

कर (Tax) : अर्थ, महत्व और आवश्यकता - उजमा तरनुम

कर (Tax) : अर्थ, महत्व और आवश्यकता - उजमा तरनुम 

कर आधुनिक शासन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। किसी देश के नागरिकों और संस्थाओं से सरकार द्वारा कानून के अनुसार जो धन प्राप्त किया जाता है, उसे कर (Tax) कहा जाता है। सरकार इस धन का उपयोग देश के विकास, जनकल्याण और प्रशासनिक कार्यों के लिए करती है। सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, परिवहन तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण और संचालन में कर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

कर मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं—प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर। प्रत्यक्ष कर वह कर है जिसे व्यक्ति या संस्था सीधे सरकार को देती है। उदाहरण के लिए आयकर और कॉरपोरेट टैक्स प्रत्यक्ष कर के प्रमुख उदाहरण हैं। दूसरी ओर, अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री पर लगाया जाता है। वस्तु एवं सेवा कर (GST) इसका प्रमुख उदाहरण है।

कर केवल सरकार की आय का साधन नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने में भी सहायता करता है। सरकार कर से प्राप्त धन का उपयोग विद्यालयों, अस्पतालों, सड़कों, रेलवे, स्वच्छता, पेयजल तथा सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर करती है। प्राकृतिक आपदा या आपातकाल जैसी परिस्थितियों में भी सरकार को आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है।

एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपनी आय और आर्थिक गतिविधियों के अनुसार निर्धारित कर का ईमानदारी से भुगतान करे। कर चोरी से सरकार को आर्थिक नुकसान होता है और विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए नागरिकों में कर के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना होना आवश्यक है।

अंततः कहा जा सकता है कि कर देश के आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण का महत्वपूर्ण साधन है। सरकार और नागरिकों के बीच सहयोग तथा ईमानदार कर-व्यवस्था से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है और विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचाया जा सकता है।

उजमा तरनुम 
कर्नाटका 

Sunday, 27 September 2026

जागो विद्यार्थी जागो - डॉ. वै . कस्तूरी बाई

जागो विद्यार्थी जागो - डॉ. वै . कस्तूरी बाई 

पक्ष खड़ा है अपनी धुन में, विपक्ष अलग हुंकार करे,
 जनता रोती बीच सड़क पर, कौन यहाँ उद्धार करे?
बेशर्म चेहरों की मुस्कानों में, झूठ का मेला सजता है,
 नालायक नेतृत्व के कारण, हर सपना चुपचाप मरता है।
ज़िद्दी अहं का शोर मचा है, घमंड गगन को छूता है,
 दादागिरी की भाषा सुनकर, संविधान भी रूठा है।
झुकना यदि हो सत्य के आगे, वह तो उत्तम आचरण है,
 पर स्वार्थों के आगे झुक जाना, राष्ट्रधर्म का मरण है।
भ्रष्ट हवाएँ बहती देखो, आरोपों का जाल बिछा,
 ग़ैर क़ानूनी चालों ने फिर, न्यायालय का द्वार खटखटा।
विद्यार्थी सब देख रहे हैं, कैसी चलती राजनीति,
 जैसा बोओगे वैसा काटो, यही समय की है नीति।
जब विद्यालय से अधिक उन्हें, नारे ही आकर्षित करते,
 ज्ञानदीप फिर मंद पड़ेंगे, सपने सारे धूल बिखरते।
हड़तालों का शोर सिखाकर, यदि श्रम का मूल्य भुलाओगे,
 अनशन को ही शक्ति बताकर, कर्मपथ कहाँ दिखलाओगे?
विदेशी हित यदि राजमुकुट का, गुप्त अभिलाषा बन जाए,
 लोभ-लालच की रिश्वत पाकर, नीति कठपुतली बन जाए।
जो अपने ही देश की नैया, स्वार्थों से डुबवाते हैं,
 इतिहासों के कठोर पृष्ठ पर, वे अपराधी कहलाते हैं।
युवकों! तुम विवेक जगाना, क्रोध नहीं, निर्माण चुनो,
 सत्य, श्रम, विज्ञान, सदाचार का, उज्ज्वल पावन मार्ग चुनो।
लोकतंत्र की शक्ति यही है— मतभेद रहें, मनभेद नहीं;
 राष्ट्र प्रथम हो, दल बाद में हों, इससे बढ़कर संदेश नहीं।
आओ मिलकर प्रण दोहराएँ— देश न बिकने पाएगा,
 ईमानों का दीप जलाकर, भारत आगे जाएगा।

डॉ. वै . कस्तूरी बाई 
बेंगलुरु 
कर्नाटक

कैश से क्लिक तक - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

कैश से क्लिक तक - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

जेब में सिक्के कम हुए,
मोबाइल में धन आ गया,
कैश की जगह अब UPI ने,
लेन-देन का रूप बदल दिया।
न नोट गिनने की झंझट है,
न छुट्टे का अब झगड़ा है,
एक क्लिक में पैसा पहुँचे,
समय का हर पल कीमती है।
दुकानदार हो या ग्राहक,
सबने नई राह अपनाई,
स्क्रीन पर आया हरा निशान,
भुगतान की खबर सुनाई।
कैशलेस भारत की ओर बढ़े,
तकनीक ने कदम बढ़ाए,
पर चार्ज और टैक्स की बातें,
कई सवाल भी साथ में लाए।
छोटे व्यापारी सोच रहे हैं,
बचत कहाँ और लागत कितनी?
ग्राहक पूछे—“सुविधा अच्छी,
पर अतिरिक्त वसूली क्यों इतनी?”
डिजिटल हो कारोबार हमारा,
पर पारदर्शिता भी साथ रहे,
मेहनत की हर कमाई का,
उचित मूल्य और विश्वास रहे।
न कैश बुरा, न UPI बुरा,
दोनों का अपना स्थान रहे,
ईमानदार हो हर लेन-देन,
ग्राहक का सम्मान रहे।
तकनीक बने सुविधा सबकी,
न बोझ बने किसी के लिए,
पैसा घूमे सहज, सुरक्षित,
न्याय मिले हर व्यक्ति के लिए।
कैश से क्लिक तक सफर है,
भारत बदल रहा आज,
डिजिटल युग की इस राह पर,
ईमानदारी ही हो राज।

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

पैसा उधार - 'ज़रिया ' डॉ मेजर मंजु चावला

पैसा उधार - 'ज़रिया ' डॉ मेजर मंजु चावला

गाना फिर बजने लगा ,
छोटा तकिया एक हाथ से दूसरे हाथ में फेंका जाने लगा,
घंटी बजी....
समझे आप ? 
ये वही खेल है जिसमें जल्दी - जल्दी तकिया दूसरों को दिया जाता है, 
ताकि कोई सज़ा न भुगतनी पड़े,
तकिया छोड़ देने में जीत है, 
तकिया रख लेने में हार है,
जिंदगी के खेल में भी यही जीत और हार है, 
वो जीता जिसने किसी का कुछ रहने नहीं दिया,
वो हारा जिसके सिर पर उधार है,
अब हम बोलें कोई तीसरा है जिसने हमसे लिया उधार, 
हम भी दूसरों को लौटा देंगे, तीसरा जब दे मेरा उधार, 
मेरी राय में हम किसी से उधार ही न लें, अगर लें तो हर हाल में वापस लौटा दें, बेहतर होगा अपनी जरूरत कम ही रखना, 
आमदनी रुपया तो खर्चा अठन्नी रखना, और किसी को हमें पैसा देना पड़ जाए, उतना ही दो जितना आराम से भूल पाएं, वापस हमको मिल जाए तो बहुत अच्छा, लेकिन कोई लौटा न पाए तब भी ना लगे बुरा, 
ना तो बच्चों को वसीयत में कर्जा दे जाना, ना अपने अगले जन्म तक कर्जा ले जाना, जो लिया उसे चुकाकर जो दिया उसे भुलाकर 
इस दुनिया से जाना ज़ीरो (शून्य ) बैलेंस बनाकर

             ' ज़रिया ' डॉ मेजर मंजु चावला
चंडीगढ़ 

Saturday, 26 September 2026

हाय! ये मुसीबत फिर लौट आई है - दीपिका पाल

हाय! ये मुसीबत फिर लौट आई है - दीपिका पाल 

UPI के चार्ज ने क्या महंगाई बढ़ाई हैं..

पहले हम तो बस UPI -UPI करते थे

अब तो पैसे निकालने पर चार्ज है इसके लिए डरते है...

देश में इन दिनों UPI चार्ज को लेकर मामला गर्म है। सरकार के ऐलान के बाद आम आदमी वर्ग से लेकर व्यापारियों में खासी नाराज़गी का माहौल है। होना भी तय है, सरकार ने 2000 रूपये के पेमेंट पर निर्धारित चार्ज लगाकर बड़ा झटका दिया है वहीं इसके पीछे एक तर्क भी दिया है। सरकार ने इस साहसी कदम को सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता खत्म करने और देश में नवाचार को बढ़ाने का रास्ता बताया है।

जाहिर सी बात है, इस पेमेंट शुल्क से गुस्सा तो होगा ही, पहले जहां हम छोटे से बड़े खर्चे में बस फोन उठाकर UPI कर लेते थे लेकिन अब ज्यादा भुगतान का शुल्क भी देना पड़ेगा।

सरकार समय - समय पर बदलाव करती है ये तो जानते है लेकिन इस कदम से एक बात तो समझ आई है नगद पैसे पास में होना जरूरी है UPI जैसी आसान सुविधा भी धोखा दे सकती है।

अभी तो सिर्फ सरकार ने बस 2000रु के पेमेंट पर शुल्क लगाने की बात की है क्या पता आने वाले समय में नए नियम जोड़ न दे जिसका ख़ामियाजा दैनिक जीवन में उठाना पड़े।

तो अंत में एक मुहावरा याद आता है, ध्यान से सुनिएगा...

रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलयुग आएगा,

हंस चुगेगा दाना दुनका, कौवा मोती खाएगा।

यानी यहां कलयुग की बात है भाई.. जैसे UPI के आने से जनता के बीच में हाहाकार मच गया वही अब इसका अगला कदम क्या होगा और असर, ये सब सरकार के दिमाग पर निर्भर है।

दीपिका पाल 
मध्य प्रदेश 

तिरंगे की छांव - सुनीता बिश्नोई

तिरंगे की छांव - सुनीता बिश्नोई

 
तिरंगे कि छांव मुझे बहुत भाती हैं,
केसरिया में सुबह की लाली,
सफेद में माँ जैसी ठंडी छांव,हरे में खेतों की हरियाली।
 
बीच में चक्र घूमे गोल-गोल,
जैसे कहे बेटी आगे बढ़ो,
न रुकना है, न झुकना है,
बस देश का नाम रोशन करना है।
 
इस छांव में पले मेरे सपने,
इस छांव में मिली मुझे उड़ान,
जवान खड़े हैं सरहद पर,
तभी तो घर में है खुशी और सुकून।
 
तिरंगे कि छांव सबसे न्यारी,
इसी में बसा है मेरा संसार,
इसी छांव में जीना है मुझे,
इसी छांव में हैं मेरा, प्यार,
 
सुनीता बिश्नोई
जिला श्री गंगानगर (राजस्थान)
 
स्वरचित एवं मौलिक ओर अप्रकाशित हैं।।
 

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद  
उत्तर  प्रदेश 

श्रेणी: नज़्म
शीर्षक: मेरी कलम में बची हुई मैं

मेरी कलम में बची हुई मैं

जब सब कुछ कहने को था,
तब शब्द कम पड़ गए थे।
और जब कहने को कुछ नहीं बचा,
तब मेरी कलम चल पड़ी।

शायद लिखना
काग़ज़ पर शब्द उतारना नहीं होता,
शायद लिखना वह रास्ता है
जिस पर चलते-चलते
इंसान एक दिन
अपने ही भीतर पहुँच जाता है।

मैंने भी कभी
बहुत यक़ीन से मोहब्बत लिखी थी—
कुछ नामों को
अपनी दुआओं में रखा,
कुछ चेहरों को
अपनी कविताओं में,
और कुछ ख़्वाबों को
इतना अपना समझ लिया
कि उनके टूटने का ख़याल भी
अजनबी लगता था।

फिर वक़्त आया।

वह किसी तूफ़ान की तरह नहीं आया था,
न उसने कोई शोर किया,
न कोई दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया।

बस धीरे-धीरे
कुछ आवाज़ें दूर होती गईं,
कुछ लोग बदलते गए,
कुछ रिश्तों के बीच
ख़ामोशी बढ़ती गई,
और कुछ ऐसे सवाल
मेरे भीतर रह गए
जिनके जवाब
किसी के पास नहीं थे।

मैंने बहुत दिनों तक
वक़्त से नाराज़ रहना चाहा।

मुझे लगता था
उसने मुझसे बहुत कुछ छीन लिया है।

फिर एक रात
बहुत देर तक जागने के बाद
मैंने अपनी पुरानी डायरी खोली।

कुछ पन्नों पर
स्याही धुँधली थी,
कुछ पर आँसुओं के निशान थे,
और कुछ पन्ने ऐसे थे
जिन पर मैंने बहुत कुछ लिखकर भी
कुछ नहीं कहा था।

मैं उन्हें पढ़ती रही।

और पहली बार
मुझे अपने पुराने शब्दों पर
तरस नहीं आया।

मुझे अपनी ही आवाज़ सुनाई दी।

एक ऐसी लड़की की आवाज़
जो हर रिश्ते को बचाना चाहती थी,
हर दूरी को मिटाना चाहती थी,
हर ख़ामोशी का मतलब जानना चाहती थी—
और इस कोशिश में
धीरे-धीरे
ख़ुद से दूर होती जा रही थी।

उस रात
मुझे समझ आया—

कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में रुकने के लिए नहीं आते,
वे हमारे भीतर
एक दरवाज़ा खोलकर चले जाते हैं।

कुछ रिश्ते
पूरा होने के लिए नहीं,
हमें पूरा करने के लिए आते हैं।

और कुछ बिछड़ने
हमें किसी और से नहीं,
हमसे मिलाने आते हैं।

मैंने उस दिन
अपना दर्द मिटाया नहीं।

बस उसे
एक जगह दे दी।

काग़ज़ पर।

फिर मैंने लिखना शुरू किया।

पहले किसी के लौट आने की उम्मीद में नहीं—
बस इसलिए कि
मेरे भीतर जो कुछ जमा था,
वह साँस ले सके।

कभी एक अधूरी कविता बनी,
कभी दो पंक्तियाँ,
कभी पूरा पन्ना
सिर्फ़ ख़ामोशी से भर गया।

कई बार
मैंने लिखकर पन्ना फाड़ दिया।

कई बार
एक ही वाक्य के सामने
घंटों बैठी रही।

और कई बार
जो कहना चाहती थी,
उसके लिए शब्द ही नहीं मिले।

तब जाना—
हर भावना को
नाम देना ज़रूरी नहीं होता।

कुछ दर्द
बस महसूस किए जाते हैं।

कुछ रिश्ते
बस याद किए जाते हैं।

और कुछ अध्याय
बस बंद कर दिए जाते हैं।

वक़्त ने मुझे
सब कुछ वापस नहीं दिया।

उसने मुझे
वह इंसान भी वापस नहीं दिया
जिसे मैं खो चुकी थी।

उसने कोई बीता हुआ दिन
मेरे लिए नहीं रोका।

लेकिन उसने एक और चीज़ दी—

नज़र।

चीज़ों को
पहले जैसा नहीं,
थोड़ा गहरा देखने की नज़र।

अब मैं जानती हूँ
कि हर ख़ामोशी नाराज़गी नहीं होती,
हर दूरी बेवफ़ाई नहीं होती,
हर अंत हार नहीं होता
और हर अधूरापन
अर्थहीन नहीं होता।

कुछ अधूरी चीज़ें
हमारे भीतर
पूरी उम्र बोलती रहती हैं।

शायद इसीलिए
मेरी कविताओं में
आज भी मोहब्बत है।

मगर अब मोहब्बत के साथ
उसकी परछाईं भी है।

अब मैं सिर्फ़
किसी के आने की कहानी नहीं लिखती,
उसके जाने के बाद
बची हुई ख़ामोशी भी लिखती हूँ।

मैं सिर्फ़
इंतज़ार नहीं लिखती,
उस दिन को भी लिखती हूँ
जब इंसान
इंतज़ार करना छोड़कर
खिड़की खोल देता है।

मैं सिर्फ़
टूटना नहीं लिखती,
उन हाथों को भी लिखती हूँ
जो बिखरे हुए टुकड़ों को
धीरे-धीरे समेटना सीखते हैं।

और शायद
वही हाथ मेरे थे।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो लगता है—
मैं जितनी बार टूटी,
उतनी बार लिखी गई।

हर चोट ने
मेरी भाषा में एक शब्द जोड़ा।

हर विदाई ने
एक विराम।

हर इंतज़ार ने
एक गहरी साँस।

और हर बार
जब मुझे लगा कि
मेरी कहानी यहीं ख़त्म हो गई,
मेरी कलम ने
अगला पन्ना खोल दिया।

अब मेरी कलम
किसी को पाने के लिए नहीं लिखती।

किसी को भूलने के लिए भी नहीं।

वह बस उन बातों को
जगह देती है
जो बोलते-बोलते
हमारे भीतर रह जाती हैं।

उन आँखों को
जिन्होंने रोना छुपाकर
मुस्कुराना सीखा।

उन लोगों को
जो सबके लिए मज़बूत रहे
और रात में
चुपचाप अपने तकिए से
कमज़ोर होने की इजाज़त माँगते रहे।

उन दिलों को
जो किसी के जाने के बाद
यह सोचते रहे—

“क्या मेरे भीतर अब भी
कुछ बचा है?”

हाँ।

बहुत कुछ बचा है।

एक सुबह बची है।

एक अधूरी कविता बची है।

एक ख़ाली पन्ना बचा है।

एक ऐसी हँसी बची है
जो अभी लौटनी बाकी है।

और सबसे बढ़कर—

ख़ुद से मिलने की
एक और कोशिश बची है।

मेरे लिए लिखना
यही कोशिश है।

जब दुनिया ने पूछा—
“तुम्हें क्या मिला?”

मेरी कलम ने पूछा—
“तुमने ख़ुद को कितना समझा?”

जब लोगों ने मेरी कहानी में
मोहब्बत ढूँढ़ी,
मुझे उसमें अपना सफ़र मिला।

जब किसी ने मेरे शब्दों में
बिछड़ना पढ़ा,
मैंने उनमें लौटना पढ़ा।

और जब किसी ने कहा—
“ये तो मेरी कहानी है,”
तब मुझे पहली बार लगा
कि शायद लेखक होना
अपनी कहानी कहना भर नहीं है।

शायद लेखक होना
अपने भीतर की सच्चाई को
इतनी ईमानदारी से लिख देना है
कि कोई अनजान इंसान भी
उसमें अपना चेहरा देख सके।

आज मेरी पहचान
किसी नाम से बड़ी नहीं,
किसी रिश्ते से छोटी नहीं।

मेरी पहचान
उन शब्दों में है
जिन्हें मैंने अपने हिस्से की ख़ामोशी से जन्म दिया।

मैंने वक़्त को लिखा,
तो उसने मुझे धैर्य दिया।

मैंने दर्द को लिखा,
तो उसने मुझे संवेदना दी।

मैंने मोहब्बत को लिखा,
तो उसने मुझे ख़ुद से मिलना सिखाया।

और मैंने ख़ुद को लिखा—
तो जाना,

जिसे मैं इतने वर्षों से
दुनिया में ढूँढ़ रही थी,
वह कहीं गया ही नहीं था।

वह यहीं था—

मेरी आवाज़ में,
मेरी ख़ामोशी में,
मेरी अधूरी पंक्तियों में,
मेरी उस कलम में
जिसे मैंने जाने कितनी बार
रख देना चाहा,
मगर हर बार
उठा लिया।

इसलिए आज
मैं अपनी कलम से
कोई वादा नहीं करती।

बस उसे चलने देती हूँ।

कभी मोहब्बत की तरफ़,
कभी वक़्त की तरफ़,
कभी दर्द की तरफ़,
और कभी
सीधे अपने भीतर।

क्योंकि अब मैं जानती हूँ—

कुछ कहानियाँ
किसी और के लौटने पर पूरी नहीं होतीं।

वे उस दिन पूरी होती हैं
जब हम ख़ुद से
दोबारा मिलते हैं।

और मेरी कहानी भी
शायद वहीं से शुरू हुई थी—

जहाँ मुझे लगा था
कि सब ख़त्म हो गया।

मैंने उस ख़ामोशी को
एक पन्ना दिया।

पन्ने को शब्द।

शब्दों को आवाज़।

और आवाज़ ने
मुझे मेरी पहचान लौटा दी।

अब मेरी कलम में
बहुत-सी कहानियाँ हैं—

कुछ मेरी,
कुछ तुम्हारी,
कुछ उन लोगों की
जिनसे मैं कभी मिली भी नहीं।

लेकिन उन सबके बीच
एक चीज़ हमेशा रहेगी—

मैं।

वह मैं
जो बहुत कुछ खोकर भी बची रही।

वह मैं
जिसने रोते हुए भी लिखा।

वह मैं
जिसने टूटकर भी
शब्दों को टूटने नहीं दिया।

और शायद
एक लेखक की सबसे सच्ची पहचान
यही होती है—

कि वह अपने बिखरे हुए हिस्सों को
स्याही में मिला दे,

और फिर
जब कोई दूसरा
उसकी रचना पढ़े,

तो उसे
अपने भीतर का कोई खोया हुआ हिस्सा
वापस मिल जाए।

मैंने बहुत कुछ लिखा है।
मगर सच यह है—
हर बार जब मेरी कलम चली,
उसने किसी और की कहानी नहीं,
मुझे ही थोड़ा-थोड़ा लिखा।

यही मेरी कलम है।
यही मेरी आवाज़ है।
और जो कुछ मेरी कलम में बचा रह गया—
वही मेरी पहचान है।