Saturday, 10 October 2026

गाँधी - भारती सरदाना

गाँधी - भारती सरदाना

सत्य अहिंसा की लाठी लिए हाथों में
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।
शांति का वह दूत प्रेम का था वह समर्थक, 
नफरत को मिटाकर दिलों में प्यार जगाने।

एक हाथ में चरखा था एक हाथ में लाठी, 
नारा था स्वदेशी का थी जान यह माटी।
भाईचारा एकता की चाह ले मन में, 
भर दिया स्वावलंबन हर एक जन में।
जात-पात धर्म की दीवार गिराने, 
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।

​असहयोग आंदोलन आमरण अनशन, 
आजादी दिलाने को किया कितने जतन।
अंग्रेजों भारत छोड़ो वह हक से कह गया, 
त्याग कर आराम कितने ज़ुल्म सह गया।
दांडी यात्रा कर आत्मनिर्भर बनाने, 
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।

​राष्ट्रपिता की पदवी बापू ने पाई, 
बदले में इस देश को नई राह दिखाई।
मां-बाप के संस्कार शिरोधार्य करके, 
बिन शस्त्र उठाए ही आजादी दिलाई।
प्रेम और स्नेह से भारत को सजाने, 
वह निकल पड़ा देश को आजादी दिलाने।


नाम - भारती सरदाना /Bharti Sardana 
पता - गुरुग्राम, हरियाणा / Gurugram, Haryana

शांति : मानव जीवन की आधारशिला - Uzma Taranum

शांति : मानव जीवन की आधारशिला - Uzma Taranum

शांति मानव जीवन की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है। जिस प्रकार स्वस्थ शरीर के लिए भोजन और स्वच्छ हवा आवश्यक है, उसी प्रकार सुखी और संतुलित जीवन के लिए शांति आवश्यक है। शांति केवल युद्ध या संघर्ष की अनुपस्थिति का नाम नहीं है, बल्कि यह मन, समाज और राष्ट्र में सौहार्द, सहयोग, सहिष्णुता और सुरक्षा की भावना का प्रतीक है।

आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं और तकनीकी प्रगति के बावजूद अनेक प्रकार के तनाव, चिंता और असंतोष से घिरा हुआ है। प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव, पारिवारिक समस्याएँ और सामाजिक मतभेद व्यक्ति के मानसिक संतुलन को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में आंतरिक शांति का महत्व और भी बढ़ जाता है। यदि मन शांत हो, तो कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति विवेकपूर्ण निर्णय ले सकता है।

शांति की शुरुआत व्यक्ति के भीतर से होती है। सकारात्मक सोच, संयम, क्षमा, आत्मविश्वास और दूसरों के प्रति सम्मान जैसे गुण व्यक्ति के जीवन में शांति स्थापित करने में सहायता करते हैं। हमें छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित होने के बजाय संवाद और समझदारी का मार्ग अपनाना चाहिए। परिवार में प्रेम और आपसी सम्मान का वातावरण हो, तो बच्चों और बड़ों दोनों के जीवन में सकारात्मकता आती है।

सामाजिक जीवन में भी शांति का विशेष महत्व है। जाति, भाषा, धर्म और विचारों की विविधता समाज की शक्ति है, लेकिन जब इन विविधताओं के कारण भेदभाव और संघर्ष उत्पन्न होता है, तब सामाजिक शांति प्रभावित होती है। इसलिए हमें एक-दूसरे के विचारों और अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेदों को हिंसा में बदलने के बजाय संवाद द्वारा सुलझाना ही सभ्य समाज की पहचान है।

राष्ट्रों के बीच शांति विश्व के विकास के लिए आवश्यक है। युद्ध से केवल जन-धन की हानि नहीं होती, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत शांतिपूर्ण वातावरण में देश विकास, विज्ञान, शिक्षा और मानव कल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। विश्व शांति के लिए सहयोग, कूटनीति, सह-अस्तित्व और मानवाधिकारों का सम्मान आवश्यक है।

महात्मा गांधी ने अहिंसा और सत्य के माध्यम से शांति का संदेश दिया। उनका विचार था कि हिंसा किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। आज भी उनके विचार मानवता को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की दिशा में प्रेरित करते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि शांति केवल सरकारों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। यदि हम अपने व्यवहार में प्रेम, सहिष्णुता, करुणा और संवाद को स्थान दें, तो परिवार से लेकर पूरे विश्व तक शांति का वातावरण बनाया जा सकता है। शांति ही मानव सभ्यता की वास्तविक प्रगति और समृद्धि की आधारशिला है।

Uzma Taranum 
Karnataka 

यमराज से नोंक-झोंक - माया मेहता

यमराज से नोंक-झोंक - माया मेहता

चाहे काल्पनिक या हकीकत दृश्य हो
अकाल मौत द्वार पर यमराज खड़े हो
स्तब्ध तन - मन मेरा क्यूं चले आए हो
शुभ दिन है मेरा अशुभ बनाने आए क्यों।।

चाहे काल्पनिक या हकीकत दृश्य हो ...........

ना संकेत ना क्रंदन उन श्वान-पंछियों के 
भूल गए वृद्धा का पता मुझसे ही लिजिए
वृद्ध पड़ोसन हैं मेरी न हाड, मांस,चाम है
आज मुझे छोड़ दें उपकार उन्हीं पर कीजिए ।।

चाहे काल्पनिक या हकीकत दृश्य हो ..............

क्रोधित यमराज बोले वक्त यूं बर्बाद न करें 
एक नाम एक राशि मोह माया में  क्यों फंसे 
कर्तव्यनिष्ठ  यमदूत  हैं कर्म हमारा धर्म है 
आपको ले जायेंगे कलयुग से मुक्ति दिलाएंगे।।

चाहे काल्पनिक हो हकीकत दृश्य हो।

बेटे के  ब्याह  पर अतिथियों  का झुंड हैं 
बोझ ज़िम्मेदारियों का आऊं कैसे छोड़ के
हाथ जोड़ विनती करूं भ्राता मुझे छोड़िए 
ताप्ती-यमुना मान के भ्राता का फर्ज निभाइये।।

चाहे काल्पनिक या हकीकत दृश्य हो ...........

'यम' की 'यमी' बन गई कृपा या चमत्कार से  
वृद्धा की स्वांस थम गई कलयुग से वो तर गई 
स्वर्ग सा माहौल है बेटे का आज ब्याह है
स्वप्न से जब जागी मैं, काश!हकीकत होता ये ।।

चाहे काल्पनिक या हकीकत दृश्य हो..................

( एक सत्य घटना पर मैं बहुत आहत हुई और मैंने काल्पनिक रुप से यमराज से नोंक-झोंक करने की कोशिश की ।)

            *माया मेहता मुंबई*

सत्य-अहिंसा के महात्मा डॉ. वै. कस्तूरी बाई

सत्य-अहिंसा के महात्मा डॉ. वै. कस्तूरी बाई 

महात्मा गांधी भारत की शान,
 उनसे ऊँचा भारत का मान।
 सत्य बना उनका जीवन-प्राण,
 अहिंसा बनी उनकी पहचान।
स्वतंत्रता का देखा था स्वप्न,
 त्याग से किया उसे उन्होंने पूर्ण।
 सत्याग्रह की लेकर मशाल,
 जगा दिया जन-जन में उजियाल।
सत्य की शक्ति जग को बताई,
 अहिंसा की राह हमें दिखाई।
 अन्याय के आगे शीश न झुकाया,
 शांति का संदेश जग में फैलाया।
स्वदेशी का मंत्र जन-जन गाया,
 चरखा घर-घर में पहुँचाया।
 चरखा केवल सूत न काता,
 स्वाभिमान का दीप जलाता।
सेवा को जीवन का धर्म बनाया,
 त्याग से भारत को बल पहुँचाया।
 सत्याग्रह से संघर्ष किया,
 अहिंसा से जन-मन जीत लिया।
महात्मा का जीवन तप की मिसाल,
 भारत के माथे का उज्ज्वल भाल।
 गांधी का सत्य अमर कहलाया,
 गांधी ने जग को सत्य सिखाया।
राष्ट्रपिता का पावन नाम,
 भारत का गौरव, भारत की शान।
 सत्य रहे तो जीवन धन्य,
 अहिंसा से हो जग कल्याण।
शांति खिले हर मानव-द्वार,
 सेवा बने प्रेम का आधार।
 स्वदेशी से बढ़े देश का मान,
 स्वतंत्र रहे अपना हिंदुस्तान।
हे महात्मा! तेरी अमर कहानी,
 आज भी लगती सबसे सुहानी।
 त्याग, सत्य, सेवा की ज्योति,
 रहे सदा भारत की ज्योति।

डॉ. वै. कस्तूरी बाई 
बेंगलूरु 
कर्नाटक

सत्य की मशाल - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

सत्य की मशाल - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

न तलवार उठाई, न कोई हथियार,
फिर भी हिला दिया था साम्राज्य का संसार।
हाथों में सत्य था, हृदय में अहिंसा,
भारत की मिट्टी ने रचा नया इतिहास।
धोती थी सादी, मगर विचार महान,
आँखों में सपने, होंठों पर हिंदुस्तान।
चल पड़े अकेले तो कारवाँ बन गया,
एक साधारण मानव—जन-जन की आवाज़ बन गया।
“सत्य ही शक्ति है”—जीवन ने समझाया,
अहिंसा के पथ पर जन-जन को चलाया।
अन्याय के आगे झुके नहीं कभी,
सत्याग्रह से जगा दी सोई हुई सभी।
चरखे की धुन में स्वाभिमान जगाया,
स्वदेशी का दीप हर घर में जलाया।
कहा—अपने श्रम पर विश्वास करो,
अपने हाथों से भारत का विकास करो।
नफरत की आँधी में प्रेम का दीप जलाया,
टूटे हुए दिलों को मानवता से मिलाया।
धर्म अलग हों, फिर भी इंसान एक है,
यही तो भारत की आत्मा का नेक संदेश है।
त्याग था जीवन, सेवा थी साधना,
राष्ट्रप्रेम ही उनकी सच्ची आराधना।
मिट्टी से उठकर मिट्टी में मिल गए,
पर विचार उनके अमर दीप बन गए।
आज भी जब दुनिया में हिंसा छा जाती है,
जब मानवता कहीं घायल हो जाती है,
तब याद आती है वह शांत-सी पुकार—
“सत्य और अहिंसा ही हैं जीवन का आधार।”
हे बापू! तुम्हारी राह कठिन सही,
पर मानवता के लिए इससे सुंदर राह नहीं।
जब तक सत्य की लौ दिलों में जलती रहेगी,
तब तक तुम्हारी गाथा दुनिया में चलती रहेगी।
नमन उस संत को, नमन उस विचार को,
नमन भारत के उस महान संस्कार को।
जिसने सिखाया—जीतना हो संसार,
तो पहले जीत लो अपने भीतर का अंधकार।
सत्य रहे, अहिंसा रहे, मानवता का मान रहे,
भारत की पावन धरती पर सदा शांति का गान रहे।

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी - डॉ. अशोक कुमार जाटव

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी - डॉ. अशोक कुमार जाटव

जब था देश पराधीन,
चारों ओर था हाहाकार,
फैल रही थी असहनीय चीत्कार,
जहाँ देखो, वहीं अत्याचार ही अत्याचार।
जुल्म ढा रहे थे फिरंगी,
क्योंकि देश था उनके अधीन,
जब राष्ट्र ने लगाई पुकार,
गांधी जी का हुआ अवतार।
किया संघर्ष, राह पकड़ी,
देश ने पकड़ी उत्कर्ष की डगर,
त्याग, तपस्या और बलिदान,
गांधी जी का रहा देश को अवदान।
राह थी सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह,
सभी संचालित रहते थे शांति से,
अंग्रेज हार मानते जाते,
गांधी जी के मार्ग से।
होली जलाई विदेशी सामानों की,
नारा था—स्वदेशी अपनाओ,
देश को स्वतंत्र कराओ,
चरखा था आधार-स्तंभ।
स्वदेशी का महत्वपूर्ण प्रकल्प,
सेवा था गांधी जी का मूलमंत्र,
नारा था—तभी आएगा प्रजातंत्र,
गांधी जी के हर कार्य ही उनकी पहचान।
राष्ट्रपिता गांधी जी हैं भारत की जान,
आज उनके कार्यों से भारत महान।

डॉ. अशोक कुमार जाटव
व्याख्याता, भोपाल, मध्यप्रदेश

स्वदेशी - डॉ मेजर मंजू चावला

स्वदेशी - डॉ मेजर मंजू चावला 

सारी धरती अच्छी है, हर एक देश प्यारा है,
गर्व हमें है सारे जहां से अच्छा देश हमारा है, 
हमको कोशिश करनी है ये और भी उन्नत हो ,
प्रगति करता ही जाए हर जगह सम्मानित हो ,
दिन रात तरक्की देश करे ये प्रयास हमारा है, 
गर्व हमें है सारे जहां से अच्छा देश हमारा है, 
बुजुर्गों का तुजुर्बा युवा शक्ति और जोश, मिलजुल कर गर काम करें उड़ा दें सबके होश ,
हर असंभव को संभव कर सकता देश हमारा है ,
गर्व हमें है सारे जहां से अच्छा देश हमारा है ,
मैं भारत हूं तुम भारत हो भारत सिर्फ जमीन नहीं ,
इसके साथ कुछ गलत करना क्या खुद की तौहीन नहीं ,
ईमानदारी से ख्याल रखना अपना दिल देश हमारा है ,
गर्व हमें है सारे जहां से अच्छा देश हमारा है ,
जितना भी मुमकिन हो आत्मनिर्भर बनाना है ,
क्यों बाहर की चीजों पर देश का पैसा बहाना है, 
स्वदेशी अपनाओ स्वदेशी अपनाओ यही देश का नारा है ,
गर्व हमें है सारे जहां से अच्छा देश हमारा है ,
लगे कभी कि दूसरे की चीज अपनी से बेहतर है, 
अपनी सुधारो इस्तेमाल करो देश में इतनी काबिलियत है ,
स्वदेशी सुधारो स्वदेशी अपनाओ मांगे देश हमारा है ,
गर्व हमें है सारे जहां से अच्छा देश हमारा है।

डॉ मेजर मंजू चावला 
चंडीगढ़ 

बेजान लोकशाही - डॉ केजे गढ़वी

बेजान लोकशाही - डॉ केजे गढ़वी

व्यर्थ गया बापू आपका बलिदान।।

हार गया संत और जीत गए शैतान।।

काले के कर्म गोरों से भी हो गए काले।

गली गली में गोडसे, गांव गांव हैवान।।

अंग्रेजी औलाद से कैसे होंगे आजाद।

गद्दारों की चुंगल में फंसा हिंदुस्तान।।

 आंगन में आग, बस्ती जैसे जलियांवाला बाग।

आंखों ने अंगारा,वतन बना रेगिस्तान ।।

अहिंसा बेमिसाल,लकड़ी को तोप झुकी थी।

भागे गोरे  उठाई झोली,यह फकीरी पहचान।।

हर होठों पर झूठ,चारों ओर मची है लुमलुंट।

हर आंखों ने खौफ,जहरीली हर जुबान।।

मां भारती कराहे, उसे कौन दिखाए राहें,।

लोकशाही भरे आहे निकल जाएगी जान। ।


,,,,,,,,,,, डॉ केजे गढ़वी 

द्वारका, गुजरात

Friday, 9 October 2026

गाँधी - मनीषा प्रसन्न

गाँधी - मनीषा प्रसन्न

सादगी का एक नाम गाँधी था जो,
आदर्शों  और विचारों की आँधी  था 
निडरता उनका हथियार 
और प्रेम उनका पैग़ाम था 
एक दो लोग नहीं, 
साथ उनके जन सैलाब था 
भेदभाव उनका ग़ुलाम था 
हिंसा उनसे घबराती थी और 
अहिंसा उनकी साथी थी 
हाथ में उनके दृढ़ इरादों की लाठी थी 
उनके आगे बुराई सर झुकाती थी 
कहने से उनके धर्म और मज़हब
गले मिलते थे 
राम और रहमान एक रास्ते पर 
संग चलते थे 
कितने सुनहरे दिन थे वो 
जब इस देश में गाँधी जैसे 
आदर्श रहते थे 
त्याग तपस्या और अहिंसा को 
हथियार बना,करते थे विरोध,
जिसको वो संघर्ष कहते थे 

गाँधी एक नाम नहीं,
एक व्यक्तित्व नहीं 
दृढ़ता, मज़बूती और 
अडिग रहने का अर्थ है 
मरते दम तक ,
सच कहने का जुनून 
बनावट और दिखावे से 
दूर रहने का सुकून 
देश के हालातों का इश्तहार थे वो 
हौसलों और इरादों का संसार थे वो 
कमज़ोरों  और ग़रीबों की शक्ति 
मानवता की भक्ति थे जो..
उनकी दुनिया में कोई सरहद नहीं 
कहतेथे वो,इंसानियत की कोई हद नहीं 

पर अफ़सोस ,आज हमें 
गाँधी की क़द्र नहीं 
अपने ही देश में निशाने ,
पर उनके आदर्श हैं ,
सवाल उठते हैं अब उनके संघर्ष पर 
अपमानित होती हैं उनकी नीतियां 
गाँधी के देश में ही, ये कैसी कुरीतियाँ 
पर गांधी आज़ाद हैं सरहदों से, 
निकल कर संकीर्णता की हदों से 
व्याप्त हैं वो एक विचार बनकर 
दुनिया में क़ायम हैं वो 
शांति की पहचान बनकर 
उनकी पहचान अब एक देश नहीं 
उनसे पहचान है मानवता की …🌹

मनीषा प्रसन्न 
स्वरचित अप्रकाशित मौलिक 
 ( मध्य प्रदेश)

शांति - संजय वर्मा "दृष्टि "

शांति - संजय वर्मा "दृष्टि "
धमाकों की गूंज से पीड़ित
शांति के कई दूत (कपोत )
अपने बच्चों को
छुपा रहे अपने पंखों से।
 
सोच रहे
शांति के
प्रतीक  के रूप में
क्यों उड़ाते है  हमें।
 
हमारा कहना कि
जब जमी पर अशांति थमे
    तभी उड़ाना हमें 
लेकिन इंसान हमारी बोली
भला कहाँ समझ पाता।
 
शांति का पाठ पढाने वालों
आतंक  पहले
खत्म करना होगा
यदि ये  हौंसला
नहीं है तो
बेवजह मत उडाओं हमें।
 
हम खुद उड़ना जानते
उड़कर बता देंगे  दुनिया को
    आतंक के खात्मे  के खिलाफ 
   आवाज उठाने के लिए 
    क्योकि 
हम ही है असली संदेश वाहक
शांति के।
 
धरती पर
आतंक को 
शांति का पाठ पढाने का 
    हम कपोत  
    हौंसला लेकर आए है।
 
संजय वर्मा "दृष्टि "
मनावर जिला -धार (म प्र )

जापान की सफलता के राज़ - सफलता, सेहत और संस्कारों का असली राज़

जापान की सफलता के राज़
सफलता, सेहत और संस्कारों का असली राज़

दुनिया में क्यों छाया है जापान? क्या आप जानते हैं कि जापानी लोग इतने सफल क्यों हैं? इसका जवाब उनके बचपन में छिपा है। जापान के लोगों की सफलता और उनकी कार्यकुशलता के पीछे उनकी खास जीवनशैली, अनुशासन और बचपन से मिले संस्कार मुख्य वजहें हैं। जापानी संस्कृति और समाज को सफल बनाने वाले मुख्य कारणों में सबसे पहली चीज़ है घर से शुरुआत। जापान में बच्चों को बहुत कम उम्र से ही अपने छोटे-मोटे काम खुद करना सिखाया जाता है। असली रहस्य घर से ही शुरू होता है। जब नन्हे-मुन्ने बच्चे कपड़े समेटना, जूते सही जगह रखना और खुद सफाई करना सीखते हैं, तो उनके दिलों में आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का दीया जलता है। स्कूल और घरों में सफाई करने और अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने से उनमें नागरिक चेतना और दूसरों के प्रति आदर पैदा होते हैं। यही वजह है कि वहां अपराध की दर इतनी कम है, क्योंकि वहां हर इंसान बचपन से ही दूसरों के अधिकारों को अपनी जान से बढ़कर सम्मान देना सीखता है।

अब सवाल यह है कि जापान के लोग इतनी मेहनत क्यों करते हैं? दरअसल, उनकी कार्य संस्कृति में कड़ी मेहनत, ईमानदारी और नए-नए तरीके खोजने की कला बसी हुई है। जापानी लोग किसी भी काम या शोध को बहुत बारीकी, लगन और गहराई से करते हैं। सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर अपने देश और समाज के हित को रखते हैं, जिससे पूरा राष्ट्र एक अटूट परिवार की तरह आगे बढ़ता है। वे मानते हैं कि समय की बर्बादी देश की बर्बादी है। दूसरी ओर, हमारे अपने प्यारे भारत में हम अक्सर "चलता है" वाले रवैये और आलस की वजह से पीछे रह जाते हैं। हम अपने देश में ऐसा इसलिए नहीं कर पा रहे क्योंकि हम सफाई और नियमों को दूसरों की जिम्मेदारी मानकर छोड़ देते हैं। अपने देश भारत को सफलता के शिखर पर ले जाने के लिए हम जापान से वक्त की पाबंदी, राष्ट्रप्रेम और निस्वार्थ स्वच्छता की सीख ले सकते हैं।

जापानियों की लंबी उम्र, मुस्कुराती सेहत और हर हाल में खुश रहने का राज़ उनके खान-पान, जीवन दर्शन और सकारात्मक सोच में छिपा है। वहां संतुलित खान-पान को जीवन का अमृत माना जाता है। जापानी लोग ताजा और मौसमी खाना पसंद करते हैं। उनकी डाइट में सी-फूड और सब्जियों की मात्रा अधिक होती है, जबकि नमक और मसालों का इस्तेमाल कम होता है। इसके साथ ही वे 'हारा हची बू' नियम का पालन करते हैं, यानी पेट भरकर ठूंसने के बजाय सिर्फ 80% ही भोजन करते हैं। इससे शरीर हल्का, दुरुस्त और बीमारियों से दूर रहता है। जापान के लोग हर हाल में खुश इसलिए रहते हैं क्योंकि वे वर्तमान में जीना पसंद करते हैं, छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ तलाशते हैं और कभी दूसरों से अपनी तुलना नहीं करते। इसके अलावा, 'इकिगाई' यानी जीने का सच्चा मकसद या लक्ष्य ढूंढने की जापानी सोच उन्हें उम्रभर मानसिक रूप से सक्रिय और तनावमुक्त रखती है। जब जीवन में हर सुबह उठने की एक सही और खूबसूरत वजह होती है, तो इंसान कभी नहीं थकता या हारता।

अभिभावकों के लिए एक सीधा और दिल से निकला संदेश यह है कि बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान की दौड़ में न दौड़ाएं, बल्कि उन्हें घर के छोटे-छोटे कामों से अपनों का हाथ बंटाना सिखाएं। जब बच्चा अपने कमरे की सफाई खुद करेगा, तो वह बड़ा होकर इस देश को अपनी मां मानकर कभी गंदा नहीं करेगा। घर के कामों से बच्चों को अनुशासन, समय प्रबंधन और मेहनत की असली कीमत समझ आती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा तिरंगा भी दुनिया में सबसे ऊँचा लहराए, तो हमें जापानी जीवनशैली के इन बेहतरीन संस्कारों को अपने घरों के आंगन से शुरू करना होगा। बच्चों में यह आदत डालना कि अपना काम स्वयं करें और दूसरों की मदद करें, राष्ट्र निर्माण की सबसे पवित्र और मजबूत सीढ़ी है।

मेरे प्यारे नन्हे दोस्तों और उनके सुपर पेरेंट्स, जौली अंकल के अनुभव से समझो कि हम भारतीय लोग भी दिल के बहुत अच्छे हैं, लेकिन जब साफ़-सफाई और टाइम की बात आती है तो बोलते हैं, "अरे भाई, बस 5 मिनट में पहुंच रहा हूं" और वो 5 मिनट में पूरी महाभारत बीत जाती है। हम लोग नई-नई चीजें खोजने की जगह 'जुगाड़' में उस्ताद हैं, लेकिन भाई, मज़ाक अपनी जगह और देश का मान अपनी जगह। अगर लाइफ में वाकई सच्चा हीरो बनना है और अपने भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन करना है, तो जापानी लोगों की तरह समय के पक्के बनो, अपना हर काम खुद करो और खाली पेट 'हारा हची बू' अपनाकर थोड़ा कम खाया करो। जब आप अपनी ख़ुशी से अपने छोटे-छोटे काम खुद करने लगोगे, तो आपका चेहरा भी चमकेगा और देश भी। अगर आप 'जापान की सफलता के राज़' को अपनी जिंदगी में उतार लेंगे, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। तो चलो, आज ही अपने जौली अंकल से वादा करो कि अभी से ही आलस को टाटा-बाय-बाय कहेंगे, जापानी अनुशासन अपनाएंगे और अपने भारत को दुनिया का सबसे प्यारा और महान देश बनाएंगे।

- जौली अंकल – 
Delhi 

Tuesday, 6 October 2026

पारदर्शिता - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

पारदर्शिता - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 

पारदर्शिता का शाब्दिक अर्थ, स्पष्टता, आर-पार दिखाई देना।
हर पहलू सबके सामने होना, कुछ भी छिपा नहीं होना। 
ऋग्वेद का अंतिम सूक्त, जिसे संगठन सूक्त भी कहते हैं।
"संगच्छध्वं, संवदध्वम,सं वो मनांसि जानताम्।"
हम एक साथ चलें, एक साथ बोलें, हमारा मन एक दूसरे को समझे, यही कहते हैं।
"यस्तिष्ठति चरति यश्च
वञ्चति यो निलायं चरति य:  प्रतङ्कम्। द्वौ संनिषद्य यन्मन्त्रयेते
राजा तद्वेद वरुणस्तृतीय:।।"
अथर्ववेद 4.16.2
में है वर्णित।
कोई दूसरे को ठगे, जब दो व्यक्ति मिलकर गुप्त मंत्रणा करें, वहाँ राजा वरुण रहते उपस्थित।
हमारे द्वारा किए गए सारे काम, भगवान से छिपे नहीं रहते।
हमारे बड़े यही कहते। 
भगवान, ब्रम्हांड के कण-कण में हैं व्याप्त।
हमारे हर कर्म की खबर, होती  उनको 
प्राप्त।
ऐसा काम क्यों करना, जो किसी 
से पड़े छुपाना। 
अपना दामन साफ रखना, औरों के काम सदा आना।
यह जीवन एक चुनौती है, 
सुख-दुख दोनों ही है मिलता।
दुराव-छिपाव क्यों करना, अपने कर्म का फल ही तो मानव को मिलता।
हर सूचना सबको मिले, हर काम में पारदर्शिता है जरूरी।
नियम स्पष्ट हो, सब मिलकर काम करें, आपस में न रहे दूरी।
आज सीसी टीवी से हम डरते हैं, सीसी टीवी के सामने, हम गलत हरकत नहीं करते।
चौबीस घंटा ईश्वर की निगाह हम पर है,
इसकी परवाह नहीं करते। 
यह सीसीटीवी कभी- कभी हम जानबूझ कर खराब करते, कभी ये किसी कारण से स्वयं खराब
होते। 
प्रभु की सीसीटीवी लगातार काम करती, वहाँ कोई व्यवधान नहीं होते।
पारदर्शिता रिश्तों में हो, रिश्ते होते मजबूत।
छिपाना हमें तभी पड़ता, जब होती हमारी गलत करतूत।
नेहरू जी ने पत्र लिखा था इंदिरा गांधी जी को, "वे जो भी काम करें, सबके सामने रोशनी में करें।"
सही काम हम करें, सही उद्देश्य से करें, फिर क्यों हम डरें?
पारदर्शिता यदि हमारे काम में हो, सब करेंगे हम पर विश्वास।
गलतफहमियां नहीं होंगी, समाज का होगा विकास।
भ्रष्टाचार घटेगा, 
हम सब उन्नति करेंगे। 
अपनों के संग हम, सफलता की सीढ़ी चढ़ेंगे।
हमें भी बच्चों को समझना होगा, ऐसा काम न करो, जो पड़े सबसे छुपाना।
तुम्हारे हर काम में पारदर्शिता हो, ऐसा काम तुम करो, देखे तुम्हें सारा जमाना। 

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
West Bangal 

Monday, 5 October 2026

चुनाव - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर मध्यप्रदेश

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय.. चुनाव - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर मध्यप्रदेश 
कविता...

चुनाव


देश के इतने बड़े लोकतंत्र में 
अक्सर चुनाव होते रहते हैं ।
आचार संहिता लगने से ही 
 जनता के काम रूक जाते है ।

सरकारी आफिसों के अफसर
बाबूओं को बहाना मिल जाता है ।
काम भले नही करना चाहते हैं
आचार संहिता का बहाना होता है ।

चुनाव लोकतंत्र की प्रक्रिया है
नेता जनता के प्रति निधि होते हैं।
चुनाव में जीतकर,पंच सरपंच, 
  पार्षद विधायक सांसद बनते हैं।

लोकतंत्र के नाम से सबको
बोट डालने की स्वतंत्रता होती है
जो नाम की ही बस रहती है
सच जनता की मजबूरी रहती है।

चुनाव लड़ने में नेता का
कुछ माप दंड जरूरी है ।
शिक्षा, साफ सुधरी छवि
नेता की होना जरूरी है ।

सांसद या विधायक हो
जनता ही इनको चुनती है ।
चुनाव जीतने के बाद में
फिर मनमानी इनकी होती है ।

राजनैतिक पार्टियां हमेशा
अपना उल्लू सीधा करती हैं ।
सत्ता की कुर्सी पाने चुनाव में
हर हथकंडे इसमें अपनाती है ।

देश के चुनाव में सभी पार्टियां
सत्ता की कुर्सी पाने लड़ती हैं ।
सारा सच है पूरा जोर लगाकर
चुनाव प्रचार पर जोर देती हैं ।

नेता चुनाव में भले लड़ते हैं
हार जीत भी होती रहती है ।
छींटा कसी आपस में करते
नेताओं की मजबूरी होती है ।

सत्ता में जो भी पार्टी आती है
अपने हिसाब से कानून बनाते हैं ।
सारा सच है नेता बनने में इनको
शिक्षा के मापदंड क्यों नहीं होते हैं ।

अनपढ़ भी सांसद, विधायक हैं
मंत्री में शिक्षा का मापदंड नही है ।
शिक्षा से कोई अवरोध न आये
ऐसा कानून भी बनाते ही नही हैं ।

किसी प्रदेश का चुनाव हो देश में
राजनीति सब आपस में करते हैं ।
हाथ जोड़ कर बोट मांगते हैं
जाति धर्म की राजनीति करते हैं।

सांसद विधायक मंत्री बनने में
बी ए की शिक्षा होना जरूरी है ।
सारे सच की बात कहूं चुनाव में
उच्च शिक्षा का मापदंड जरूरी है ।

खानदानी राजनीति चलती है
पिता के बाद पुत्र नेता बनते है ।
कोई कोई तो पति-पत्नी पुत्र बहू
पूरा परिवार चुनाव में खड़े होते हैं।

चुनाव जो पार्टी हार जाती है
बोट चोरी का इल्ज़ाम लगाते हैं ।
कुछ पार्टियां ए टी एम मशीन में
छेड़ छाड़  का आरोप लगाते हैं ।

संसद में जो कानून बने उसमें
जनता का बहुमत होना चाहिए।
आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यूजीसी कानून खत्म होना चाहिए।

एस सी एस टी एक्ट लगाकर 
लाखों रुपया सरकार देती है ।
दलालों के माध्यम से ही तो
आपस में राशि बंट जाती है ।

एम सी एस टी एक्ट यूजीसी 
कानून से सरकार का विरोध है ।
सवर्ण का पूरे देश आन्दोलन 
और जमकर विरोध हो रहा है ।

आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यूजीसी कानून समाप्त होना चाहिए।
ये कानून समाप्त हुए नहीं तो सवर्णों  
के विरोध से सरकार बदल जायेगी 

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
    जबलपुर म प्र

विश्व पर्यटन दिवस - सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह

विश्व पर्यटन दिवस - सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह

           (27 सितंबर को हर साल) 
           (कविता/काव्य तरंग)

विश्व पर्यटन दिवस के शुभ अवसर पर हमारी ओर से सभी पर्यटकों को ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं एवं अशेष बधाइयां।
           
27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है हरेक साल,
पर्यटन स्थल आय का बड़ा स्रोत है,  कई देश होते हैं मालामाल।
देश विदेश से पर्यटक आते जाते रहते हैं, घूमने फिरने के लिए,
सर्दियों में गर्म इलाके और गर्मियों में लोग घूमते हैं नैनीताल।
27 सितंबर को...........

जिस देश में पर्यटकों को मिलती सुरक्षा और अधिक सुविधा,
वहां आने जाने को लेकर नहीं होती मन में कोई भी दुविधा।
लोग सैर सपाटे और अपनी छुट्टियां बिताने के लिए आते हैं,
प्रकृति प्रेमियों के मन में आता है पर्यटन का सुंदर ख्याल।
27 सितंबर को...........

पर्यटन से मानव जीवन में आता है बहुत ही बड़ा बदलाव,
तन मन से दूर होता है तनाव, सकारात्मक होता स्वभाव।
जिंदगी में एक नई उमंग आ जाती, खुशियां बढ़ जाती हैं ,
मन में जन्म नहीं लेते हैं जल्दी कभी उल्टे सीधे सवाल।
27 सितंबर को..........

इसके लिए लोग बहुधा पर्वतीय क्षेत्रों को पसंद करते हैं,
अवसर मिलने पर, योजना बनाकर घर से निकलते हैं।
पर्यटन मंत्रालय के ऊपर बहुत जिम्मेवारी रहती इसकी,
पर्यटन विभाग करता, सारे पर्यटकों की पूरी देखभाल।
27 सितंबर को............

प्रमाणित किया जाता है कि यह रचना स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसका सर्वाधिकार कवि/कलमकार के पास सुरक्षित है।

सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह,
नासिक (महाराष्ट्र)

मतदान - संजय वर्मा'दृष्टि'

मतदान - संजय वर्मा'दृष्टि'
 
मतदान करने सबको जाना है
सबके ये बातें समझाना है

मतदान हमारा मूल अधिकार है
लोकतंत्र को ये बडा त्यौहार है

पर्ची अन्य विकल्प साथ ले जाना है
मतदान करने का हक़ भी पाना है

उत्साह जागरूकता मन मे लाना है
शत प्रतिशत हो मतदान ये दिखाना है

मतदान से लोकतंत्र को मजबूत बनाना है
क्षेत्र को खुशहाली व उन्नतिशील बनाना है 

संजय वर्मा'दृष्टि'
मनावर(धार)मप्र

कसम की कसम - जौली अंकल

कसम की कसम - जौली अंकल

हमारे देश भारत में खानपान की अद्भुत विविधता है। कोई सुबह उठकर गरमा-गरम परोंठो, समोसों का शौकीन है, तो कोई दोपहर में कुरकुरे डोसे का दीवाना। लेकिन अगर थोड़ा गहराई से देखें, तो भारत में सुबह से लेकर रात तक सबसे ज़्यादा कोई चीज़ चाव से खाई जाती है, तो वह है 'कसम'। बचपन में बात-बात पर विद्या माता की कसम या मम्मी-पापा की कसम खाकर बड़े होने की यह आदत उम्र के साथ छूटती नहीं, बल्कि और ज़्यादा वीआईपी और राजसी हो जाती है। वार्ड पार्षद और विधायक से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक, जब भी कोई नई कुर्सी संभालता है, तो सबसे पहले एक भव्य शपथ ग्रहण समारोह होता है। नए कड़क कपड़े पहनकर, ईश्वर और संविधान को साक्षी मानकर ऐसी कसम खाई जाती है मानो आज से ही जनता के बैंक खाते में खुशियों की लॉटरी लगने वाली है और नेता जी अपना हर पल जनहित में ही गुज़ारेंगे।

अफ़सोस की बात यह है कि कुछ नेता जी कसम का वह सरकारी कागज़ इतनी हड़बड़ी में पढ़ते हैं, मानो पीछे उनकी ट्रेन छूट रही हो। भारी-भरकम शब्दों को ठीक से बोल भी नहीं पाते। इसके बाद जो महारथी इसे शुद्ध-शुद्ध पढ़ भी लेते हैं, वे राजभवन के मुख्य द्वार से बाहर निकलते ही अपनी चमचमाती गाड़ी की एसी की ठंडी हवा खाते ही सब कुछ भूल जाते हैं। टीवी पर जो चेहरा अत्यंत मासूम और विनम्र लग रहा था, दफ़्तर पहुंचते ही बड़े और कड़क मालिक में तब्दील हो जाता है। ऐसा लगता है कि वह पवित्र कसम सिर्फ उस एक दिन मुफ्त की तालियां बटोरने के लिए थी, ज़िंदगी भर निभाने के लिए नहीं। चुनाव जीतने से पहले जो नेता जी जनता के सामने पूरी तरह झुककर हाथ जोड़ रहे थे, कुर्सी पर बैठते ही जनता को पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। लोकतंत्र के इस रंगमंच पर कसम की गरिमा हर पाँच साल में टूटती है। जनता हर बार एक नई कसम पर भरोसा करती है और बदले में सिर्फ कोरे आश्वासन पाती है। कसम खाने को हमारे देश में ऐसा नुस्खा मान लिया गया है जिससे काम पूरा करना हो या घोटाला दबाना, हर मर्ज़ का इलाज मुमकिन है। विकसित देशों में नेताओं के वादे कानूनी दस्तावेज़ की तरह होते हैं जहाँ कसम तोड़ने पर सीधे कुर्सी गँवानी पड़ती है, लेकिन हमारे यहाँ कसम खाना एक ऐसी कला बन चुकी है जिसमें जितना बड़ा कलाकार, उसकी कुर्सी उतनी ही सुरक्षित।

जौली अंकल के अनुसार इस भयंकर भूलने की बीमारी का एक बड़ा जादुई इलाज मौजूद है। जैसे हम अपने घरों में शादी या अवॉर्ड्स की तस्वीरें फ्रेम करवाकर लगाते हैं, वैसे ही हर मंत्री और नेता को अपने शपथ पत्र की प्रतिलिपि को एक शानदार फोटो फ्रेम में जड़वाना चाहिए। इस फ्रेम को उनके सरकारी दफ़्तर की मुख्य दीवार पर और घर के ड्राइंग रूम में सोफे के ठीक सामने टांग दिया जाए। जब भी वे मखमली सोफे पर बैठकर चाय की चुस्की लें या किसी फाइल पर दस्तखत करने के लिए पेन उठाएं, तो वह कसम सीधे उनकी आँखों में आँखें डालकर उन्हें घूर रही हो। यह चमचमाता फ्रेम उन्हें हमेशा याद दिलाता रहेगा कि कुर्सी की असली गरिमा क्या है और करोड़ों उम्मीदों से भरे वादों की वास्तविक कीमत क्या है।

इस फ्रेम के लगने से नेताओं की अंतरात्मा रोज़ सुबह एक बार ज़रूर जागेगी और उन्हें याद दिलाएगी कि वे जनता के मालिक नहीं, बल्कि चुने गए सेवक हैं। जब भी कोई वीआईपी मेहमान दफ़्तर आएगा, तो सबसे पहले उस कसम के फ्रेम को देखेगा, जिससे नेता जी पर नैतिक दबाव बना रहेगा। यह लोकतंत्र का ऐसा आईना होगा जो नेता जी को उनकी असलियत दिखाता रहेगा। राजनीति में जब तक ऐसा कड़ा और रचनात्मक बदलाव नहीं आएगा, तब तक कसम सिर्फ एक रस्म बनी रहेगी और जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती रहेगी।

आखिर में देश के सभी नेताओं से विनती है कि आज तक जो हुआ उसे भूलकर आज यह कसम खाओ कि पद संभालते समय जो कसम खाई थी, उस कसम की कसम कि उस कसम को आज के बाद कभी नहीं भूलेंगे। जब आप अपनी खाई हुई कसम के हर एक शब्द को अपनी मेहनत से सच करके दिखाएंगे और ईमानदारी से काम करेंगे, तभी इस देश की आम जनता के चेहरे पर सच्ची मुस्कान वापस आएगी।

- जौली अंकल

Sunday, 4 October 2026

पोषण दिवस — आइए मिलकर खुशियाँ बाँटें

पोषण दिवस — आइए, मिलकर खुशियाँ बाँटें 🌸

इस बुधवार को बादशाहपुर आंगनवाड़ी में पोषण दिवस के अवसर पर लगभग 200 महिलाओं के लिए गुड़-चना एवं केले वितरित करने की एक छोटी-सी पहल की जा रही है।

हमारा उद्देश्य केवल भोजन बाँटना नहीं, बल्कि पोषण, स्वास्थ्य और जागरूकता का संदेश हर परिवार तक पहुँचाना है।

हमारा विश्वास है कि समाज में बदलाव हमेशा बड़ी चीज़ों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सहयोग और नेक प्रयासों से शुरू होता है। 🙏

यदि आप भी इस पहल का हिस्सा बनना चाहते हैं और गुड़-चना, केले या किसी अन्य रूप में सहयोग करना चाहते हैं, तो कृपया संपर्क करें:

आपका छोटा-सा सहयोग किसी के लिए
पोषण, सम्मान और मुस्कान का कारण बन सकता है। 

आइए, इस पोषण दिवस पर मिलकर एक ऐसा संदेश दें—
“हर महिला स्वस्थ, हर परिवार सशक्त।”