विजयादशमी — बुराई पर अच्छाई की विजय
जब-जब धरती पर पाप बढ़ा,
जब-जब सत्य का दीप बुझा,
तब-तब धर्म ने राह दिखाई,
श्रीराम ने मर्यादा सिखलाई।
विजयादशमी का पावन त्योहार,
लाता है खुशियों की बहार,
रावण के दस सिर जलते हैं,
पर प्रश्न हृदय में पलते हैं।
क्या केवल पुतला जलाने से,
मुक्ति मिलेगी बुरे विचारों से?
जब मन में अहंकार समाया है,
तो किस रावण को जलाया है?
रावण तो हर मन में रहता है,
क्रोध, लोभ बनकर वह बहता है,
ईर्ष्या, छल और अभिमान मिटाएँ,
मन में प्रेम का दीप जलाएँ।
सीता के सम्मान की रक्षा हो,
हर नारी को सुरक्षित पथ मिले,
सत्य, दया और धर्म के आगे,
अन्याय का हर बंधन खुले।
राम केवल एक नाम नहीं हैं,
वे आदर्शों का पैगाम हैं,
सत्य, त्याग, करुणा, मर्यादा,
उनके जीवन के अनुपम धाम हैं।
विजय तभी सच्ची कहलाएगी,
जब मानवता मुस्कुराएगी,
जब निर्धन को अधिकार मिलेगा,
हर बेटी को सम्मान मिलेगा।
नफरत की दीवारें तोड़ें,
प्रेम के रिश्ते सबसे जोड़ें,
जाति-धर्म के भेद मिटाकर,
मानवता से नाता जोड़ें।
आओ, इस दशहरे प्रण लें हम,
सदाचार के पथ पर चलें हम,
अपने भीतर के रावण को,
सच्चाई की शक्ति से हरें हम।
न झूठ का साथ निभाएँगे,
न अन्याय के आगे झुक पाएँगे,
सत्य और न्याय की राहों पर,
नवभारत का दीप जलाएँगे।
जब मन से अहंकार मिटेगा,
जब हर हृदय प्रेम से खिलेगा,
तभी रामराज्य आएगा,
हर घर सुख-शांति पाएगा।
आओ, ऐसा पर्व मनाएँ,
मन के विकारों को दूर भगाएँ,
केवल पुतले नहीं, बुराइयाँ जलाएँ,
सच्चे अर्थों में विजयादशमी मनाएँ।
बुराई पर अच्छाई की विजय का,
यही संदेश अमर हो जाए,
हर हृदय में राम विराजें,
हर जीवन मंगलमय हो जाए।
जय श्रीराम! जय विजयादशमी! 
डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab

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