अहंकार का अंत - डा गंगा शरण पासी
महा ज्ञानी रावण था अहंकारी, वेदों का ज्ञाता होकर भी, किया पाप भारी, पर स्त्री का किया हरण, और बन बैठा महा अहंकारी, अपना ही विनाश कर बैठा, यमराज को दे डाली चुनौती, मंदोदरी को किया अपमान, माता सीता का हरण करके, पाप का घड़ा भर डाला, वरदान का किया गलत उपयोग, वेदों का ज्ञाता होकर भी, किया अधर्म काम, विजयदशमी यह सिख देती, कभी न बनना जीवन में अहंकारी, सत्य की राह पर चलते जाना, करना धर्म का काम भारी, मिट जाती है अहंकार में, सोने की लंका, बच जाती केवल राख, दशहरा हमें यही सिखाता, करो धर्म का काम हमेशा, नारी का न कभी करो अपमान।
डा गंगा शरण पासी
कवयित्री लेखिका समाज-सुधारक रायपुर
छत्तीसगढ़

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