रावण - यशपाल निर्मल
समय की काली दीवार पर किसने टाँग दिया है
दस चेहरों वाला एक सूरज,
जिसकी हर किरण से अँधेरा और गहरा होता है!
लंका
अब समुद्र के उस पार नहीं,
हमारी आँखों के भीतर उगती है।
सोने की ईंटों के नीचे कराहती हैं
असंख्य इच्छाएँ,
और सिंहासन के पायों से बंधी हैं
कितनी ही मौन जिह्वाएँ।
रावण!
तुम्हारी नाभि में अमृत था, हमारी नाभियों में
भूख का जलता हुआ कुआँ है।
तुम्हारे दस सिर थे,
हमने एक ही सिर में
सौ मुखौटे उगा लिए हैं।
एक मुख पर वेदों की ऋचाएँ,
दूसरे पर न्याय का उजला चंदन,
तीसरे पर धर्म की ध्वजा, चौथे पर जनसेवा की मुस्कान—
भीतर मगर लोभ का काला नाग
कुंडली मारकर बैठा है।
अशोक-वाटिका
आज भी हरी है,
पर उसकी डालियों पर सीताएँ नहीं,
टँगे हुए हैं असंख्य प्रश्न। हवा उनके आँचल छूकर लौट जाती है चुपचाप, और पहरेदारों की आँखों में सोया रहता है राजधर्म।
राम का धनुष
किसी संग्रहालय की दीवार पर ।
धूल ओढ़े पड़ा है।
प्रत्यंचा की जगह समझौतों का महीन धागा है,
और तीरों की नोक पर सत्ता की मुहर लगी है।
हर वर्ष मैदान में
एक काग़ज़ी रावण जलता है,
लपटें उठती हैं,
बच्चे तालियाँ बजाते हैं, राख हवा में उड़ती है— मगर उसी राख से
अगली सुबह
एक नया मुकुट उग आता है।
रावण!
तुम्हारी मृत्यु का रहस्य किसी बाण में नहीं छिपा, वह उस क्षण में सोया है जब मनुष्य
अपने भीतर के अँधेरे को अँधेरा कहने का साहस करेगा।
तब कोई अग्नि
पुतले को नहीं,
अहंकार की जड़ों को छुएगी;
तब विजयादशमी के आकाश में
धुआँ नहीं,
एक निर्मल सूर्योदय खिलेगा।
(जम्मू - कश्मीर)

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