टेलीपैथी का चमत्कार (मन से मन के तार)
कल्पना कीजिए कि आप किसी सुनसान रेगिस्तान या घने जंगल में भटक गए हैं। मोबाइल की बैटरी खत्म हो चुकी है और नेटवर्क गायब हैं। ऐसे में अगर आप बिना फोन या बिना किसी साधन के सिर्फ अपने दिमाग से अपने दोस्त को यह संदेश भेज सकें कि भाई पिज्जा लेकर तुरंत यहाँ पहुँच जाओ और वह आपकी बात सुन ले। सुनने में यह थोड़ा फिल्मी और मजेदार जरूर लगता है, लेकिन बिना किसी साधन जैसे बोलना लिखना या इशारे के एक मन से दूसरे मन तक अपने विचारों और भावनाओं को पहुँचाने की इसी कला को टेलीपैथी या दूरानुभूति कहते हैं। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1882 में फ्रेडरिक डब्ल्यू एच मायर्स ने किया था। जैसे टेली शब्द से टेलीविजन दूर की तस्वीरें दिखाता है और टेलीफोन दूर की आवाज सुनाता है, ठीक वैसे ही हमारा दिमाग भी एक कंप्यूटर की तरह दूर बैठे इंसान के विचारों को पकड़ सकता है। महाभारत काल में संजय के पास भी तो यही दिव्य दृष्टि थी, जिससे उन्होंने घर बैठे धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध का पूरा हाल सुना दिया था।
टेलीपैथी किस प्रकार कार्य करती है और इसका ढांचा क्या है, इसे समझने के लिए हमें रेडियो का उदाहरण लेना होगा। टेलीपैथी के मुख्य रूप से दो सबसे जरूरी हिस्से होते हैं। पहला ‘सेंडर’ यानी विचार भेजने वाला और दूसरा ‘रिसीवर’ यानी विचार पाने वाला। जब सेंडर अपने मन में कोई साफ विचार बनाता है, तो उसका अवचेतन मन विचार तरंगें बाहर निकालता है। यदि रिसीवर का मन भी शांत और एकाग्र हो, तो वह इन तरंगों को तुरंत पकड़ लेता है। उदाहरण के लिए कई बार आप अपनी मम्मी के पास जाने ही वाले होते हैं कि वे अचानक रसोई से आवाज देती हैं कि जरा बाज़ार से धनिया ले आना। या आप अपने किसी पुराने दोस्त को याद कर ही रहे होते हैं कि अचानक उसका फोन आ जाता है। यह कोई टोना टोटका नहीं बल्कि हमारे अवचेतन मन का वही अदृश्य नेटवर्क है जो अक्सर अनजाने में आपस में जुड़ जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या टेलीपैथी का कोई वैज्ञानिक अस्तित्व है और इसके क्या फायदे हैं। अगर हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला के नियमों पर टेलीपैथी को पूरी तरह से साबित नहीं मानता और इसे परामनोविज्ञान का विषय कहता है। हालांकि विज्ञान यह जरूर मानता है कि इंसानी दिमाग में अद्भुत ऊर्जा होती है। टेलीपैथी के फायदों की बात करें तो यह हमारी एकाग्रता और छठवीं इंद्री को बहुत मजबूती देती है। इसका सबसे बड़ा फायदा मुश्किल स्थितियों में हो सकता है जहाँ कोई तकनीक काम न करे। इसके अलावा यह इंसानी रिश्तों को गहरा बनाती है। जैसे कई बार बिना कुछ कहे ही आपकी बेस्ट फ्रेंड समझ जाती है कि आपका समोसा खाने का मूड है या ब्रेकअप का दुख। धर्म और अध्यात्म में इसे ध्यान की आखिरी सीमा माना गया है, जहाँ मन की शांति से आप किसी भी दूर बैठे व्यक्ति की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं।
कई लोग पूछते हैं कि क्या टेलीपैथी खुद से सीखी जा सकती है और इसे सीखने का तरीका क्या है। जी हाँ, इसे रोज के अभ्यास और मन के अनुशासन से सीखा जा सकता है। टेलीपैथी का अभ्यास करने के लिए सबसे पहले किसी शांत कमरे में बैठें, गहरी सांसें लें और अपने दिमाग से दिनभर की फालतू चिंताओं को बाहर निकाल दें। इसके बाद अपनी आंखें बंद करके अपने किसी करीबी दोस्त या घर के सदस्य का एकदम साफ चेहरा दिमाग में बनाए। अब अपने संदेश को बिल्कुल छोटा, सरल और साफ रखें, जैसे मुझे याद करो या मुझे तुरंत कॉल करो। इस संदेश को अपने मन में दोहराएं और सोचें कि रोशनी की एक किरण आपके दिमाग से निकलकर सीधे आपके दोस्त के दिमाग में जा रही है। संदेश भेजने के बाद सब्र रखें और पूरा विश्वास बनाए रखें। शुरुआत में अपने किसी प्यारे दोस्त के साथ इसका रोज 10 मिनट अभ्यास करें। हो सकता है कि पहले दिन वह आपको सिर्फ मैसेज में पूछे कि और भाई क्या हाल हैं, लेकिन यही आपके दिमाग के बिना तार वाले नेटवर्क की पहली जीत होगी।
आज का मानव ज्ञान और तकनीक के इस दौर में बहुत आगे बढ़ चुका है। हम चांद और मंगल तक पहुँच गए हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि इतना ज्ञान होने के बाद भी इंसान की सोच कभी-कभी संकीर्ण, हिंसक और मूर्ख बनी रहती है। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से वीडियो कॉल पर तो बात कर लेते हैं, लेकिन पास बैठे इंसान के दिल का दर्द नहीं समझ पाते। टेलीपैथी हमें सिखाती है कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारे भीतर ही छिपी है। अगर हम अपने अवचेतन मन की गहराई को समझ लें और अपने मन को शांत करना सीख जाए, तो हमें किसी इंटरनेट नेटवर्क की जरूरत नहीं पड़ेगी। टेलीपैथी केवल एक रहस्यमयी विद्या नहीं बल्कि मन की शुद्धता, एकाग्रता और आपसी जुड़ाव का एक खूबसूरत जरिया है। तो जौली अंकल की बात मान कर बिना देर किये ही अपनी आंखें बंद कीजिए, अपने दिमाग का नेटवर्क चालू कीजिए और अपने किसी खास दोस्त को मन ही मन संदेश भेजकर देखिए कि आपके दिल की बात उसके मन तक पहुँचती है या नहीं।
- जौली अंकल

No comments:
Post a Comment