पैसा उधार - 'ज़रिया ' डॉ मेजर मंजु चावला
गाना फिर बजने लगा ,
छोटा तकिया एक हाथ से दूसरे हाथ में फेंका जाने लगा,
घंटी बजी....
समझे आप ?
ये वही खेल है जिसमें जल्दी - जल्दी तकिया दूसरों को दिया जाता है,
ताकि कोई सज़ा न भुगतनी पड़े,
तकिया छोड़ देने में जीत है,
तकिया रख लेने में हार है,
जिंदगी के खेल में भी यही जीत और हार है,
वो जीता जिसने किसी का कुछ रहने नहीं दिया,
वो हारा जिसके सिर पर उधार है,
अब हम बोलें कोई तीसरा है जिसने हमसे लिया उधार,
हम भी दूसरों को लौटा देंगे, तीसरा जब दे मेरा उधार,
मेरी राय में हम किसी से उधार ही न लें, अगर लें तो हर हाल में वापस लौटा दें, बेहतर होगा अपनी जरूरत कम ही रखना,
आमदनी रुपया तो खर्चा अठन्नी रखना, और किसी को हमें पैसा देना पड़ जाए, उतना ही दो जितना आराम से भूल पाएं, वापस हमको मिल जाए तो बहुत अच्छा, लेकिन कोई लौटा न पाए तब भी ना लगे बुरा,
ना तो बच्चों को वसीयत में कर्जा दे जाना, ना अपने अगले जन्म तक कर्जा ले जाना, जो लिया उसे चुकाकर जो दिया उसे भुलाकर
इस दुनिया से जाना ज़ीरो (शून्य ) बैलेंस बनाकर
' ज़रिया ' डॉ मेजर मंजु चावला
चंडीगढ़
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