तिरंगे की छांव - सुनीता बिश्नोई
तिरंगे कि छांव मुझे बहुत भाती हैं,
केसरिया में सुबह की लाली,
सफेद में माँ जैसी ठंडी छांव,हरे में खेतों की हरियाली।
बीच में चक्र घूमे गोल-गोल,
जैसे कहे बेटी आगे बढ़ो,
न रुकना है, न झुकना है,
बस देश का नाम रोशन करना है।
इस छांव में पले मेरे सपने,
इस छांव में मिली मुझे उड़ान,
जवान खड़े हैं सरहद पर,
तभी तो घर में है खुशी और सुकून।
तिरंगे कि छांव सबसे न्यारी,
इसी में बसा है मेरा संसार,
इसी छांव में जीना है मुझे,
इसी छांव में हैं मेरा, प्यार,
सुनीता बिश्नोई
जिला श्री गंगानगर (राजस्थान)
स्वरचित एवं मौलिक ओर अप्रकाशित हैं।।

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