Saturday, 26 September 2026

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद  
उत्तर  प्रदेश 

श्रेणी: नज़्म
शीर्षक: मेरी कलम में बची हुई मैं

मेरी कलम में बची हुई मैं

जब सब कुछ कहने को था,
तब शब्द कम पड़ गए थे।
और जब कहने को कुछ नहीं बचा,
तब मेरी कलम चल पड़ी।

शायद लिखना
काग़ज़ पर शब्द उतारना नहीं होता,
शायद लिखना वह रास्ता है
जिस पर चलते-चलते
इंसान एक दिन
अपने ही भीतर पहुँच जाता है।

मैंने भी कभी
बहुत यक़ीन से मोहब्बत लिखी थी—
कुछ नामों को
अपनी दुआओं में रखा,
कुछ चेहरों को
अपनी कविताओं में,
और कुछ ख़्वाबों को
इतना अपना समझ लिया
कि उनके टूटने का ख़याल भी
अजनबी लगता था।

फिर वक़्त आया।

वह किसी तूफ़ान की तरह नहीं आया था,
न उसने कोई शोर किया,
न कोई दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया।

बस धीरे-धीरे
कुछ आवाज़ें दूर होती गईं,
कुछ लोग बदलते गए,
कुछ रिश्तों के बीच
ख़ामोशी बढ़ती गई,
और कुछ ऐसे सवाल
मेरे भीतर रह गए
जिनके जवाब
किसी के पास नहीं थे।

मैंने बहुत दिनों तक
वक़्त से नाराज़ रहना चाहा।

मुझे लगता था
उसने मुझसे बहुत कुछ छीन लिया है।

फिर एक रात
बहुत देर तक जागने के बाद
मैंने अपनी पुरानी डायरी खोली।

कुछ पन्नों पर
स्याही धुँधली थी,
कुछ पर आँसुओं के निशान थे,
और कुछ पन्ने ऐसे थे
जिन पर मैंने बहुत कुछ लिखकर भी
कुछ नहीं कहा था।

मैं उन्हें पढ़ती रही।

और पहली बार
मुझे अपने पुराने शब्दों पर
तरस नहीं आया।

मुझे अपनी ही आवाज़ सुनाई दी।

एक ऐसी लड़की की आवाज़
जो हर रिश्ते को बचाना चाहती थी,
हर दूरी को मिटाना चाहती थी,
हर ख़ामोशी का मतलब जानना चाहती थी—
और इस कोशिश में
धीरे-धीरे
ख़ुद से दूर होती जा रही थी।

उस रात
मुझे समझ आया—

कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में रुकने के लिए नहीं आते,
वे हमारे भीतर
एक दरवाज़ा खोलकर चले जाते हैं।

कुछ रिश्ते
पूरा होने के लिए नहीं,
हमें पूरा करने के लिए आते हैं।

और कुछ बिछड़ने
हमें किसी और से नहीं,
हमसे मिलाने आते हैं।

मैंने उस दिन
अपना दर्द मिटाया नहीं।

बस उसे
एक जगह दे दी।

काग़ज़ पर।

फिर मैंने लिखना शुरू किया।

पहले किसी के लौट आने की उम्मीद में नहीं—
बस इसलिए कि
मेरे भीतर जो कुछ जमा था,
वह साँस ले सके।

कभी एक अधूरी कविता बनी,
कभी दो पंक्तियाँ,
कभी पूरा पन्ना
सिर्फ़ ख़ामोशी से भर गया।

कई बार
मैंने लिखकर पन्ना फाड़ दिया।

कई बार
एक ही वाक्य के सामने
घंटों बैठी रही।

और कई बार
जो कहना चाहती थी,
उसके लिए शब्द ही नहीं मिले।

तब जाना—
हर भावना को
नाम देना ज़रूरी नहीं होता।

कुछ दर्द
बस महसूस किए जाते हैं।

कुछ रिश्ते
बस याद किए जाते हैं।

और कुछ अध्याय
बस बंद कर दिए जाते हैं।

वक़्त ने मुझे
सब कुछ वापस नहीं दिया।

उसने मुझे
वह इंसान भी वापस नहीं दिया
जिसे मैं खो चुकी थी।

उसने कोई बीता हुआ दिन
मेरे लिए नहीं रोका।

लेकिन उसने एक और चीज़ दी—

नज़र।

चीज़ों को
पहले जैसा नहीं,
थोड़ा गहरा देखने की नज़र।

अब मैं जानती हूँ
कि हर ख़ामोशी नाराज़गी नहीं होती,
हर दूरी बेवफ़ाई नहीं होती,
हर अंत हार नहीं होता
और हर अधूरापन
अर्थहीन नहीं होता।

कुछ अधूरी चीज़ें
हमारे भीतर
पूरी उम्र बोलती रहती हैं।

शायद इसीलिए
मेरी कविताओं में
आज भी मोहब्बत है।

मगर अब मोहब्बत के साथ
उसकी परछाईं भी है।

अब मैं सिर्फ़
किसी के आने की कहानी नहीं लिखती,
उसके जाने के बाद
बची हुई ख़ामोशी भी लिखती हूँ।

मैं सिर्फ़
इंतज़ार नहीं लिखती,
उस दिन को भी लिखती हूँ
जब इंसान
इंतज़ार करना छोड़कर
खिड़की खोल देता है।

मैं सिर्फ़
टूटना नहीं लिखती,
उन हाथों को भी लिखती हूँ
जो बिखरे हुए टुकड़ों को
धीरे-धीरे समेटना सीखते हैं।

और शायद
वही हाथ मेरे थे।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो लगता है—
मैं जितनी बार टूटी,
उतनी बार लिखी गई।

हर चोट ने
मेरी भाषा में एक शब्द जोड़ा।

हर विदाई ने
एक विराम।

हर इंतज़ार ने
एक गहरी साँस।

और हर बार
जब मुझे लगा कि
मेरी कहानी यहीं ख़त्म हो गई,
मेरी कलम ने
अगला पन्ना खोल दिया।

अब मेरी कलम
किसी को पाने के लिए नहीं लिखती।

किसी को भूलने के लिए भी नहीं।

वह बस उन बातों को
जगह देती है
जो बोलते-बोलते
हमारे भीतर रह जाती हैं।

उन आँखों को
जिन्होंने रोना छुपाकर
मुस्कुराना सीखा।

उन लोगों को
जो सबके लिए मज़बूत रहे
और रात में
चुपचाप अपने तकिए से
कमज़ोर होने की इजाज़त माँगते रहे।

उन दिलों को
जो किसी के जाने के बाद
यह सोचते रहे—

“क्या मेरे भीतर अब भी
कुछ बचा है?”

हाँ।

बहुत कुछ बचा है।

एक सुबह बची है।

एक अधूरी कविता बची है।

एक ख़ाली पन्ना बचा है।

एक ऐसी हँसी बची है
जो अभी लौटनी बाकी है।

और सबसे बढ़कर—

ख़ुद से मिलने की
एक और कोशिश बची है।

मेरे लिए लिखना
यही कोशिश है।

जब दुनिया ने पूछा—
“तुम्हें क्या मिला?”

मेरी कलम ने पूछा—
“तुमने ख़ुद को कितना समझा?”

जब लोगों ने मेरी कहानी में
मोहब्बत ढूँढ़ी,
मुझे उसमें अपना सफ़र मिला।

जब किसी ने मेरे शब्दों में
बिछड़ना पढ़ा,
मैंने उनमें लौटना पढ़ा।

और जब किसी ने कहा—
“ये तो मेरी कहानी है,”
तब मुझे पहली बार लगा
कि शायद लेखक होना
अपनी कहानी कहना भर नहीं है।

शायद लेखक होना
अपने भीतर की सच्चाई को
इतनी ईमानदारी से लिख देना है
कि कोई अनजान इंसान भी
उसमें अपना चेहरा देख सके।

आज मेरी पहचान
किसी नाम से बड़ी नहीं,
किसी रिश्ते से छोटी नहीं।

मेरी पहचान
उन शब्दों में है
जिन्हें मैंने अपने हिस्से की ख़ामोशी से जन्म दिया।

मैंने वक़्त को लिखा,
तो उसने मुझे धैर्य दिया।

मैंने दर्द को लिखा,
तो उसने मुझे संवेदना दी।

मैंने मोहब्बत को लिखा,
तो उसने मुझे ख़ुद से मिलना सिखाया।

और मैंने ख़ुद को लिखा—
तो जाना,

जिसे मैं इतने वर्षों से
दुनिया में ढूँढ़ रही थी,
वह कहीं गया ही नहीं था।

वह यहीं था—

मेरी आवाज़ में,
मेरी ख़ामोशी में,
मेरी अधूरी पंक्तियों में,
मेरी उस कलम में
जिसे मैंने जाने कितनी बार
रख देना चाहा,
मगर हर बार
उठा लिया।

इसलिए आज
मैं अपनी कलम से
कोई वादा नहीं करती।

बस उसे चलने देती हूँ।

कभी मोहब्बत की तरफ़,
कभी वक़्त की तरफ़,
कभी दर्द की तरफ़,
और कभी
सीधे अपने भीतर।

क्योंकि अब मैं जानती हूँ—

कुछ कहानियाँ
किसी और के लौटने पर पूरी नहीं होतीं।

वे उस दिन पूरी होती हैं
जब हम ख़ुद से
दोबारा मिलते हैं।

और मेरी कहानी भी
शायद वहीं से शुरू हुई थी—

जहाँ मुझे लगा था
कि सब ख़त्म हो गया।

मैंने उस ख़ामोशी को
एक पन्ना दिया।

पन्ने को शब्द।

शब्दों को आवाज़।

और आवाज़ ने
मुझे मेरी पहचान लौटा दी।

अब मेरी कलम में
बहुत-सी कहानियाँ हैं—

कुछ मेरी,
कुछ तुम्हारी,
कुछ उन लोगों की
जिनसे मैं कभी मिली भी नहीं।

लेकिन उन सबके बीच
एक चीज़ हमेशा रहेगी—

मैं।

वह मैं
जो बहुत कुछ खोकर भी बची रही।

वह मैं
जिसने रोते हुए भी लिखा।

वह मैं
जिसने टूटकर भी
शब्दों को टूटने नहीं दिया।

और शायद
एक लेखक की सबसे सच्ची पहचान
यही होती है—

कि वह अपने बिखरे हुए हिस्सों को
स्याही में मिला दे,

और फिर
जब कोई दूसरा
उसकी रचना पढ़े,

तो उसे
अपने भीतर का कोई खोया हुआ हिस्सा
वापस मिल जाए।

मैंने बहुत कुछ लिखा है।
मगर सच यह है—
हर बार जब मेरी कलम चली,
उसने किसी और की कहानी नहीं,
मुझे ही थोड़ा-थोड़ा लिखा।

यही मेरी कलम है।
यही मेरी आवाज़ है।
और जो कुछ मेरी कलम में बचा रह गया—
वही मेरी पहचान है।

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