नीरव नभ में चाँद खिला - निवेदिता शुक्ला
नीरव नभ में चाँद खिला
झरती रजनी उजियारी ,
वन पथ पर चुपचाप चली
जैसे सपनों की सुकुमारी ।
मंद पवन ने चुरा लिया
फूलों के अधरों का मधुर गान ,
ओस कणों में मुस्काया फिर
भोर का कोमल अरुणिम प्राण ।
दूर क्षितिज के पार कहीं
मन का दीपक जलता है,
अनजाने किसी मधुर मिलन को
हृदय निरंतर चलता है।
कौन पुकारे नीरवता में
ये कौन छुए मन के सुप्त तार ,
चांँद उतर कर पूछ रहा
किसका है ये मधुर इंतज़ार?
निवेदिता शुक्ला
इटावा, उत्तर प्रदेश

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