Friday, 24 July 2026

लोकतंत्र के बदलते मायने - अर्चना डबराल


लोकतंत्र के बदलते मायने - अर्चना डबराल
.
बदल गए हैं आज लोकतंत्र के मायने,
जिस नींव पर खड़ा हुआ था कल भारत हमारा,
बदल दिए गए हैं उसके सारे नियम-कायदे।
आज सच बोलना जैसे कोई संगीन गुनाह हो,
ज़रा सा लब खोलो, तो सामने खड़ी सलाखें हैं।
पर अगर हुक्मरानों के आगे झूठ के पुल बाँधो,
तो गले में सजती हैं ज़हरीली फूल-मालाएँ।
सोचता हूँ, आगे आने वाली मासूम पीढ़ी को
क्या सीख, क्या विरासत दे रहा है यह लोकतंत्र?
जहाँ शिक्षा की इमारतें जर्जर हाल में सिसक रही हैं,
जहाँ डिग्रियों के पन्नों पर बेकारी की धूल जमी है,
जहाँ युवाओं को उम्मीदों के उजाले देने के बजाय,
लाचारी में आत्मदाह की राह दिखा रहा है यह लोकतंत्र!सड़कों पर अनशन और धरने का सहारा लेने को
हर रोज़ मजबूर हो रही है यह भोली लोकतांत्रिक जनता।
मुखौटों के पीछे छुप गए हैं सारे वादे,
सिर्फ़ कागज़ के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं इरादे।
अगर जनता ही चुप रही, तो ये मायने और बदलेंगे,
सवाल पूछना ही होगा... वरना ये सन्नाटे हमें निगलेंगे!
जिस देश में जनता को मालिक होना था,
वहाँ अपनी ही जायज़ आवाज़ बुलंद करने के लिए,
अपने ही हक़ का एक तिनका माँगने के लिए,
सड़कों पर अनशन और धरने का सहारा लेने को
हर रोज़ मजबूर हो रही है यह भोली लोकतांत्रिक जनता।
मुखौटों के पीछे छुप गए हैं सारे वादे,
सिर्फ़ कागज़ के पन्नों में सिमट कर रह गए हैं इरादे।
अगर जनता ही चुप रही, तो ये मायने और बदलेंगे,
सवाल पूछना ही होगा... वरना ये सन्नाटे हमें निगलेंगे!

अर्चना डबराल
दिल्ली 

No comments:

Post a Comment