काँवड़ में केवल जल नहीं / डॉ . प्रो. वै. कस्तूरी बाई
सावन आया, नभ ने ओढ़ी,
हरित धरा की सुंदर चूनर,
गूँज उठे शिव-नाम दिशाओं में,
भक्ति हुई मन की अंतर्ध्वनि मधुरतर।
काँवड़ लेकर भक्त चले हैं,
गंगाजल है शीश सजाए,
हर-हर महादेव की ध्वनि से,
पथ के कण-कण पुण्य बनाए।
यह जल केवल जल नहीं है,
आस्था का निर्मल उपहार,
बूँद-बूँद में भाव समाया,
शिव को अर्पित प्रेम अपार।
पग-पग पर संयम हो अपना,
मन में श्रद्धा, वाणी में शांति,
काँवड़ यात्रा तभी बनेगी,
जब उसमें हो सेवा-कांति।
नशे की धूम न छाए पथ पर,
मदिरा-मादकता दूर भगाएँ,
भक्ति-पथ को कलंकित करके,
कैसे भोलेनाथ को पाएँ?
न हो हुड़दंग, न हो उपद्रव,
न किसी हृदय को पीड़ा पहुँचे,
जिस यात्रा में शिव का वास हो,
वहाँ अहंकार कैसे ठहरे?
प्रशासन भी सजग रहे और,
मार्ग सुरक्षित, स्वच्छ बनाए,
श्रद्धालु भी नियमों का पालन,
कर्तव्य-बोध हृदय में लाए।
काँवड़िया जब जल चढ़ाए,
साथ मनुजता भी चढ़ जाए,
क्रोध, कलह, छल, मद त्यागकर,
अंतर का अंधकार मिटाए।
शिव तो उस जल से प्रसन्न हों,
जिसमें निर्मल भाव समाया;
सच्ची पूजा वही समझिए,
जिसने मानव-धर्म निभाया।
हर-हर महादेव! की ध्वनि हो,
पर शांति रहे संसार में,
गंगाजल से शिव का अभिषेक हो,
और करुणा हो व्यवहार में।
काँवड़ केवल कंधों पर नहीं—
वह संस्कृति का भार है;
भक्ति तभी सार्थक होगी,
जब अनुशासन ही श्रृंगार है।
डॉ . प्रो. वै. कस्तूरी बाई
बेंगलूरु
कर्नाटक
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