Friday, 28 August 2026

कुर्सी का खेल / डॉ अनुपमा वर्मा

 कुर्सी का खेल / डॉ अनुपमा वर्मा

राजनीति की बिसात बिछी,
हर मोहरा तैयार है,
कुर्सी जिसकी हाथ लगी,
वही आज सरदार है।
कल तक थे जो साथ-साथ,
आज बने बागी हैं,
इस्तीफे की चिट्ठी लेकर,
सबकी आँखों में आँधी है।
आदेश आया—“शांत रहो”,
सूचना आई—“बवाल है”,
नेता बोले—“सब नियंत्रण में”,
जनता बोली—“क्या कमाल है!”
कहीं भगदड़, कहीं हंगामा,
कहीं भाषणों की भरमार,
एक-दूजे पर आरोप लगाकर,
सब करते अपना प्रचार।
जो कल तक थे मंच के साथी,
आज वही गिरफ्तार हैं,
सियासत के इस खेल में,
कितने चेहरे बेकरार हैं।
बोखलाहट जब बढ़ जाती है,
शब्दों की तलवार चले,
जनता पूछे—“काम बताओ”,
नेता फिर समाचार बने।
कुर्सी बोले—“मुझको बचाओ”,
नेता बोले—“मैं तैयार”,
देश खड़ा है चुपचाप मगर,
पूछ रहा है बारंबार—
“इस्तीफा हो या बगावत हो,
बवाल हो या गिरफ्तार,
जनता के हित में कौन खड़ा है
कौन निभाएगा अपना किरदार?”
राजनीति का खेल रहे,
पर मर्यादा मत हारो,
सत्ता आए, सत्ता जाए,
जनता को मत भूलो यारो!
कुर्सी केवल कुर्सी है,
जनसेवा ही सम्मान,
लोकतंत्र तभी मजबूत बने,
जब जागे हर इंसान।

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

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