Thursday, 6 August 2026

GenZ प्रोटेस्ट


 युवा प्रदर्शनकारियों के पक्ष और विपक्ष में हमने बहुत कुछ कह लिया. आइए अब कुछ सार्थक कर लें. समस्या हमें पता चल गई शिक्षा व्यवस्था की बदहाली. समाधान क्या है? आइए अब इस पर भी हम भागीदारी निभाएं. कैसे हमारे देश का शिक्षा तंत्र ठीक हो सकता है? कैसे अच्छी और समान शिक्षा तक अमीरों और गरीबों की पहुंच के अंतर को पाटा जा सकता है? मैं यहां अपने कुछ सुझाव रख रहा हूं. आप भी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए जो सोचते हैं, वो सार्वजनिक करें. सत्ता पक्ष, विपक्ष, आम नागरिक और सबसे ऊपर GenZ, सभी को इस महायज्ञ में अपनी और से आहुति देनी है. मेरा मानना है, ऐसे विचार मंथनों से ही अमृत निकलेगा...


GenZ के प्रोटेस्ट पर विराम लग गया है. जंतर मंतर पर युवाओं का मेला उठ चुका है. छात्र डटे तो प्रधान हटे. एक तीर से कई निशाने सध गए हैं...

सत्ता पक्ष जान गया अहंकार से युवा नहीं हांके जा सकते. विपक्ष को पता चल गया, लोगों से जुड़ना है तो जनहित के लिए सड़क पर संघर्ष करना ही होगा. मीडिया को कड़ा संदेश मिल गया है, अपना ढर्रा नहीं बदला, लोगों के असल मुद्दे नहीं उठाए तो शटर गिरना तय है...

आइए, अब देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मैं क्या सोचता हूं, वो आपसे साझा करता हूं. मेरी नज़र में भारत की हर समस्या (गरीबी, भूख, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य) का मूल शिक्षा तंत्र की खामियां हैं. मेरी समझ से अगर इस मुद्दे पर अब ठीक से ध्यान दिया जाए तो उसका फल 15-20 साल बाद मिलना शुरू होगा. लेकिन कभी न कभी तो पहल करनी ही होगी...

देश में शिक्षा पर सबसे ज़्यादा निवेश किया जाना चाहिए. इस निवेश का फायदा आज नहीं तो कल ज़रूर मिलेगा. देश के हर बच्चे को शिक्षा दिलाने की ज़िम्मेदारी सरकार ले. इसके लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाए. किसी हकीम ने थोड़े ही कहा है कि हर बच्चा ग्रेजुएट बनने के बाद ही सम्मान का हकदार हो सकता है. ओलिम्पिक्स में वो अगर गोल्ड ले आता है तो क्या 1.40 अरब भारतवासियों का सीना गर्व से चौड़ा नहीं होगा?...

देश में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई जाती जिसमें बिना जाति, मजहब, देखे छोटी उम्र में ही बच्चों की स्क्रीनिंग कर ली जाए. ये क्यों नहीं तय कर लिया जाता कि आखिर बच्चे में कितनी प्रतिभा है और वो किस फील्ड में ज़्यादा बेहतर कर सकता है. मान लीजिए ये तय हो गया कि किसी बच्चे में एथलीट बनने के लिए अच्छा पोटेंशियल है. तो फिर उसे क्यों नहीं दिन रात उसके खेल की ही प्रैक्टिस कराई जाती. किताबी शिक्षा उसे उतनी ही दी जाए जितने में वो अपना रोज़मर्रा का काम चला सके. उसका मुख्य ध्येय अपने खेल में ही अव्वल बनने का होना चाहिए. रोज़गार के लिए इसी तरह बच्चे को किसी न किसी हाथ के हुनर में भी दक्ष बनाने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए. जिससे कि नौकरी न भी मिले तो वो खुद का काम करके आत्मनिर्भर बन सके...

जर्मनी में बच्चों की औपचारिक शिक्षा शुरू होने से पहले ही उन्हें साइकिल में पंचर, फ्यूज़ लगाना, नल ठीक करना जैसे व्यावहारिक कार्य भी सिखाए जाते हैं. जर्मनी में एक और अच्छी बात भी है. अगर वहां अभिभावक बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने में समर्थ नहीं हैं तो सरकार उसकी जिम्मेदारी लेती है. जब वो बच्चा बड़ा होकर कुछ बन जाता है, अच्छा कमाने लगता है तो फिर वो पे—बैक करता है. उस पैसे से फिर किसी ज़रूरतमंद बच्चे की मदद होती है. ऐसा ही कुछ देश में भी किया जा सकता है...

एक देश, एक सिलेबस का मुद्दा देश में पहले भी उठता रहा है. कहा ये भी जाता है कि देश के हर बच्चे का शिक्षा पर समान अधिकार हो. लेकिन क्या प्रैक्टिकली यह मुमकिन है. गांव-देहात या छोटे शहर का बच्चा भले ही दिमाग से कितना तेज़ हो लेकिन क्या अंग्रेज़ी बोलने में महानगरों के पांचसितारा स्कूलों के बच्चों के सामने टिक सकता है. एक तरफ़ पांच पांच लाख रुपए फीस लेने वाले भव्य स्कूल हैं, दूसरी तरफ़ बदहाल सरकारी स्कूल हैं. मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्सेज में एडमिशन के लिए नामी गिरामी कोचिंग सेंटर हैं जो लाखों में मोटी फीस वसूलते हैं. ज़ाहिर है अंग्रेज़ीदां होने का हर जगह एडवांटेज है...

मेरी राय में हर बड़ी प्रतियोगी परीक्षा में अंग्रेज़ी जितना वेटेज ही देश की दूसरी भाषाओं को दिया जाए. अंग्रेजी जानने के महत्व को मैं नकार नहीं रहा हूं. लेकिन इसके लिए SAME PLAYING FIELD  बनाना ज़रूरी है. आज ऑनलाइन टूल्स के ज़रिए बहुत कुछ किया जा सकता है. अगर गांव-देहात में अच्छे शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं तो महानगरों से ही वीडियो प्रोजेक्शन के ज़रिए पढ़ाई कराई जाए. छात्रों के साथ बस एक समन्वयक मौजूद रहे. बच्चों को मनोवैज्ञानिक तरीके से दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में बैठे एक्सपर्ट्स ही बढ़िया तरीके से पढ़ा सकते हैं. इसके लिए देश के कोने-कोने में मज़बूत कनेक्टिवटी का होना जरूरी है. डिजिटल क्रांति के इस युग में सब कुछ किया जा सकता है. बस इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए...  

मेरा एक सवाल ये भी है कि क्या हर बच्चे को कथित ग्रेजुएट बनाना ज़रूरी है? देश के चप्पे-चप्पे पर विश्वविद्यालय मौजूद हैं लेकिन वहां पढ़ाई का स्तर कैसा है किसी से छुपा नहीं है. ऐसा नहीं होता तो देश के दूर-दराज से बच्चे हर साल दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए दौड़ नहीं लगाते. गुणवत्ता वाले उच्च शिक्षा संस्थानों तक बिना किसी भेदभाव पहुंचने का अधिकार उन्हीं छात्र-छात्राओं को मिले जो वाकई इसके लिए काबिलियत रखते हो. Quantity की जगह Quality को तरजीह दी जाए. बेशक कम उच्च शिक्षा संस्थान हों लेकिन वो गुणवत्ता के मामले में विश्व स्तरीय होने चाहिए...

मैं आपको मेरठ में पढ़ाई के अपने दिनों का अनुभव बताता हूं. आसपास कृषि प्रधान भूमि होने की वजह से गांव-कस्बों से बच्चे बड़ी संख्या में यहां कॉलेज की पढ़ाई के लिए आते हैैं. मुझे अच्छी तरह याद है कि कुछ लड़के उस भले वक्त में अपने घरों पर कहते थे कि ब्लॉटिंग पेपर की ज़रूरत है, इसलिए पांच सौ रुपये भेज दो. अब बेचारा किसान पिता किसी तरह भी पेट काटकर बेटे को पैसे का इंतज़़ाम कर भेजता. शहर में कॉलेज की पढ़ाई कर लेने वाला बच्चा फिर गांव लौटकर फार्मिंग की नहीं सोचता. उसे ग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट होने के बाद शहर में ही कोई बढ़िया नौकरी चाहिए. देश में नौकरियां आखिर कितनी हैं, जो ढंग की नौकरियां हैं वो ढंग के विश्वविद्यालयों से ढंग की पढ़ाई करने वाले कुछ ही छात्र पाते हैं. फिर थोक के भाव से निकलने वाले अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र कहां जाएं...

देश में बेरोज़गारों की फौज में हर साल तेजी से इज़ाफ़ा हो रहा है तो ये सरकार, सिस्टम के साथ हम सब की भी हार है. हम सब भी सिस्टम से अलग नहीं है. आइए सब इस सूरत-ए-हाल को बदलने के लिए हाथ बढ़ाएं. ये मेरे और आपके बच्चों के साथ देश के हर नौनिहाल के भविष्य का सवाल है...

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