गवां बैठे - आशी प्रतिभा
वो ज़माने हम गंवा बैठे,
वो ख़ज़ाने हम गंवा बैठे
आज कुछ नहीं जोड़ने को,
सलीक़े पुराने हम गंवा बैठे।।
महफ़िलें तो सजी हैं आज बहुत,
पर वो हँसने के बहाने हम गंवा बैठे
ईंट-पत्थर के मकां तो बना लिए,
मिट्टी के वो घराने हम गंवा बैठे।।
जिसे ढूँढती है आज ये दुनिया,
वो सुकून-ए-दिल हम गंवा बैठे
रफ़्तार तो मिल गई है ज़िंदगी को,
ठहरने के वो ज़माने हम गंवा बैठे।।
आशी प्रतिभा
Madhya Pradesh

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