रक्षाबंधन / संगीता पीयूष सहज
भाई की कलाई पर जब राखी सजती है,
बहना के चेहरे पर इक खुशी खिलती है।
बचपन की वो बातें फिर याद आती हैं,
आँगन में हँसी जैसे फिर से उतरती है।
वो रूठना, मनाना और लड़ना-झगड़ना,
फिर प्यार से मिलने की चाहत जगती है।
मिठाई की खुशबू, तिलक की वो थाली,
हर ओर प्रेम की खुशबू महकती है।
बहना की दुआओं में भाई की खुशियाँ,
भाई के प्यार से बहना सँवरती है।
रिश्ता ये केवल धागे का नहीं है,
ये दिल से दिलों की डोर जुड़ती है।
दूरियाँ भले ही कितनी बढ़ जाएँ,
रिश्तों में कहाँ कभी दूरी रहती है।
भाई हो परेशां तो बहना भी रोती है,
बहना के आँसू से भाई की आँख भरती है।
हर मुश्किल में भाई ढाल बन जाए,
बहना भी हिम्मत बन साथ चलती है।
ईश्वर से यही है दुआ आज मेरी,
हर भाई की बहना सदा मुस्कुराती रहे,
हर बहन के सिर पर भाई का साया,
और प्रेम की खुशियाँ सदा बरसती रहें।
राखी का ये पावन त्योहार हर वर्ष आए,
हर घर में खुशियों की फुहार लाए,
न टूटे कभी ये पवित्र प्रेम-बंधन,
हर जन्म भाई-बहन का प्यार लाए।
संगीता पीयूष सहज
(sangeeta piyush sahaj)
वसुंधरा, गाजियाबाद
Vadundhra, ghaziabad

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