रक्षासूत्र — प्रेम का अमर बंधन / डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई
रक्षाबंधन आया लेकर, प्रेम-सुधा की पावन धार,
बहन सजाए स्नेह-सुमन से, भाई का मंगल संसार।
रेशम-धागा मात्र नहीं यह, विश्वासों का दृढ़ संधान,
इसमें बहता निर्मल स्नेह, इसमें बसता शुभ अरमान।
बहना बाँधे राखी पावन, रोली-अक्षत, मंगल गान,
भाई देता रक्षा-वचन, बहना पाती सुख-आशीष महान।
मिष्ठान्नों की मधुर सुगंध से, महके आँगन, द्वार-द्वार,
हँसी-खुशी के दीप जलें, मिट जाए मन का हर अंधकार।
कृष्ण-सुदामा की मित्रता में, स्नेह-समानता का संदेश,
द्रौपदी के करुण पुकार पर, कृष्ण बने रक्षा-विशेष।
कर्णावती की राखी ने भी, इतिहासों में रचा विधान,
हुमायूँ ने बहन के सम्मान हेतु, निभाया अपना वचन महान।
यम-यमुना का पावन संबंध, भाई-दूज तक देता ज्ञान,
रक्त-संबंध से बढ़कर होता, हृदयों का पावन सम्मान।
सीमाओं पर प्रहरी भाई, मातृभूमि की रक्षा करते,
बहनें घर में दीप जलाकर, उनके मंगल की कामना धरते।
भारत से लेकर विश्व-भूमि तक, गूँजे बंधुत्व का गान,
जाति, देश और भेद मिटाकर, मानव बने परस्पर प्राण।
राखी बाँधे केवल कलाई नहीं, बाँधे मानवता का विश्वास,
दीन-दुःखी के आँसू पोंछें, यही हो सच्चा प्रेम-विकास।
बहन बने स्नेहिल शक्ति, भाई बने भरोसे की ढाल,
हर घर में सौहार्द खिले, हर मन हो निर्मल, निष्कलुष, विशाल।
आओ इस पावन पर्व पर, लें मानवता का दृढ़ संकल्प—
रक्षा हो हर नारी की, प्रेम बने जीवन का विकल्प।
रक्षाबंधन केवल उत्सव नहीं, संस्कृति का उज्ज्वल सम्मान,
राखी के इस पावन सूत्र में, बँधा रहे अखिल विश्व-परिवार महान!
डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई
कर्नाटक
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