Sunday, 13 September 2026

कलम की आवाज़ / डॉ। प्रो। वै। कस्तूरी बाई


कलम की आवाज़ / डॉ। प्रो। वै। कस्तूरी बाई 

खबरों के इस दौर में,
 सच की तलाश कहाँ है?
 अखबारों के पन्नों पर
 जनता की आवाज़ कहाँ है?
मीडिया लोकतंत्र का दर्पण,
 पत्रकार उसका प्रहरी है,
 अंधेरों से लड़ती कलम
 जन-मन की सच्ची प्रहरी है।
सवाल उठाना धर्म उसका,
 सच दिखलाना कर्म है,
 झूठ के ऊँचे महलों से
 टकराना उसका धर्म है।
कहीं भूख की चीख दबती,
 कहीं किसान की पीड़ा है,
 कहीं श्रमिक पसीना बहाए,
 कहीं न्याय की राह अँधेरी है।
मारपीट हो, धमकी आए,
 फिर भी कलम न झुक पाए,
 सत्ता के गलियारों में
 सच का दीप जलाती जाए।
खबर वही जो सत्य कहे,
 न भय देखे, न लोभ करे,
 जनता के विश्वास को लेकर
 हर अक्षर दायित्व धरे।
पर जब खबर बिकने लगे,
 सच पर पर्दा पड़ने लगे,
 शब्दों की कीमत तय हो जाए,
 तब लोकतंत्र भी डरने लगे।
न्यूज़ केवल सनसनी नहीं,
 न आरोपों का व्यापार बने,
 किसी की पीड़ा, किसी की इज़्ज़त
 सुर्खियों का हथियार न बने।
पत्रकार की कलम अगर
 निर्भय होकर बोल उठे,
 झूठ के सारे मुखौटे
 एक-एक करके खोल उठे।
मीडिया की आवाज़ बने
 उनका स्वर जो मौन खड़े हैं,
 जिनके अधिकारों के दीपक
 आँधियों में भी नहीं बुझे हैं।
कलम न बिके, खबर न झुके,
 सत्य कभी लाचार न हो—
 लोकतंत्र के इस मंदिर में
 जनता से बड़ा कोई अखबार न हो।
हर खबर बने जनदर्पण,
 सत्य रहे सर्वोपरि,
 पत्रकार का संकल्प अडिग।
सच की स्याही सूख न जाए,
 प्रश्नों की आवाज़ रुक न जाए;
 जब तक कलम में प्राण रहे—
 भारत का लोकतंत्र झुक न जाए!

डॉ। प्रो। वै। कस्तूरी बाई 
कर्नाटक

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