कसम की कसम - जौली अंकल
हमारे देश भारत में खानपान की अद्भुत विविधता है। कोई सुबह उठकर गरमा-गरम परोंठो, समोसों का शौकीन है, तो कोई दोपहर में कुरकुरे डोसे का दीवाना। लेकिन अगर थोड़ा गहराई से देखें, तो भारत में सुबह से लेकर रात तक सबसे ज़्यादा कोई चीज़ चाव से खाई जाती है, तो वह है 'कसम'। बचपन में बात-बात पर विद्या माता की कसम या मम्मी-पापा की कसम खाकर बड़े होने की यह आदत उम्र के साथ छूटती नहीं, बल्कि और ज़्यादा वीआईपी और राजसी हो जाती है। वार्ड पार्षद और विधायक से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक, जब भी कोई नई कुर्सी संभालता है, तो सबसे पहले एक भव्य शपथ ग्रहण समारोह होता है। नए कड़क कपड़े पहनकर, ईश्वर और संविधान को साक्षी मानकर ऐसी कसम खाई जाती है मानो आज से ही जनता के बैंक खाते में खुशियों की लॉटरी लगने वाली है और नेता जी अपना हर पल जनहित में ही गुज़ारेंगे।
अफ़सोस की बात यह है कि कुछ नेता जी कसम का वह सरकारी कागज़ इतनी हड़बड़ी में पढ़ते हैं, मानो पीछे उनकी ट्रेन छूट रही हो। भारी-भरकम शब्दों को ठीक से बोल भी नहीं पाते। इसके बाद जो महारथी इसे शुद्ध-शुद्ध पढ़ भी लेते हैं, वे राजभवन के मुख्य द्वार से बाहर निकलते ही अपनी चमचमाती गाड़ी की एसी की ठंडी हवा खाते ही सब कुछ भूल जाते हैं। टीवी पर जो चेहरा अत्यंत मासूम और विनम्र लग रहा था, दफ़्तर पहुंचते ही बड़े और कड़क मालिक में तब्दील हो जाता है। ऐसा लगता है कि वह पवित्र कसम सिर्फ उस एक दिन मुफ्त की तालियां बटोरने के लिए थी, ज़िंदगी भर निभाने के लिए नहीं। चुनाव जीतने से पहले जो नेता जी जनता के सामने पूरी तरह झुककर हाथ जोड़ रहे थे, कुर्सी पर बैठते ही जनता को पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। लोकतंत्र के इस रंगमंच पर कसम की गरिमा हर पाँच साल में टूटती है। जनता हर बार एक नई कसम पर भरोसा करती है और बदले में सिर्फ कोरे आश्वासन पाती है। कसम खाने को हमारे देश में ऐसा नुस्खा मान लिया गया है जिससे काम पूरा करना हो या घोटाला दबाना, हर मर्ज़ का इलाज मुमकिन है। विकसित देशों में नेताओं के वादे कानूनी दस्तावेज़ की तरह होते हैं जहाँ कसम तोड़ने पर सीधे कुर्सी गँवानी पड़ती है, लेकिन हमारे यहाँ कसम खाना एक ऐसी कला बन चुकी है जिसमें जितना बड़ा कलाकार, उसकी कुर्सी उतनी ही सुरक्षित।
जौली अंकल के अनुसार इस भयंकर भूलने की बीमारी का एक बड़ा जादुई इलाज मौजूद है। जैसे हम अपने घरों में शादी या अवॉर्ड्स की तस्वीरें फ्रेम करवाकर लगाते हैं, वैसे ही हर मंत्री और नेता को अपने शपथ पत्र की प्रतिलिपि को एक शानदार फोटो फ्रेम में जड़वाना चाहिए। इस फ्रेम को उनके सरकारी दफ़्तर की मुख्य दीवार पर और घर के ड्राइंग रूम में सोफे के ठीक सामने टांग दिया जाए। जब भी वे मखमली सोफे पर बैठकर चाय की चुस्की लें या किसी फाइल पर दस्तखत करने के लिए पेन उठाएं, तो वह कसम सीधे उनकी आँखों में आँखें डालकर उन्हें घूर रही हो। यह चमचमाता फ्रेम उन्हें हमेशा याद दिलाता रहेगा कि कुर्सी की असली गरिमा क्या है और करोड़ों उम्मीदों से भरे वादों की वास्तविक कीमत क्या है।
इस फ्रेम के लगने से नेताओं की अंतरात्मा रोज़ सुबह एक बार ज़रूर जागेगी और उन्हें याद दिलाएगी कि वे जनता के मालिक नहीं, बल्कि चुने गए सेवक हैं। जब भी कोई वीआईपी मेहमान दफ़्तर आएगा, तो सबसे पहले उस कसम के फ्रेम को देखेगा, जिससे नेता जी पर नैतिक दबाव बना रहेगा। यह लोकतंत्र का ऐसा आईना होगा जो नेता जी को उनकी असलियत दिखाता रहेगा। राजनीति में जब तक ऐसा कड़ा और रचनात्मक बदलाव नहीं आएगा, तब तक कसम सिर्फ एक रस्म बनी रहेगी और जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती रहेगी।
आखिर में देश के सभी नेताओं से विनती है कि आज तक जो हुआ उसे भूलकर आज यह कसम खाओ कि पद संभालते समय जो कसम खाई थी, उस कसम की कसम कि उस कसम को आज के बाद कभी नहीं भूलेंगे। जब आप अपनी खाई हुई कसम के हर एक शब्द को अपनी मेहनत से सच करके दिखाएंगे और ईमानदारी से काम करेंगे, तभी इस देश की आम जनता के चेहरे पर सच्ची मुस्कान वापस आएगी।
- जौली अंकल

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