Monday, 21 September 2026

राखी - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

 राखी - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
असुरों का पलड़ा था भारी, जब हो रहा था देवासुर संग्राम। 
देवराज इंद्र ने देवगुरु
वृहस्पति से पूछा, कैसे होगी जीत अपनी, कैसे बनेगा अपना काम। 
इंद्र पत्नी इंद्राणी (शची) ने
रक्षा धागा, देवराज इंद्र की कलाई पर बांध दिया।
सावन पूर्णिमा का दिन था वह, जीत हुई इंद्र की, अपना सिंहासन उन्होंने वापस पा लिया।
विश्वास था, इसी धागे ने दिलाई जीत।
सावन पूर्णिमा के दिन, रक्षा बांधने की है रीत।
त्रेता युग में प्रभु ने, लिया वामन अवतार।
कश्यप जी-अदिति जी के पुत्र, पहुंचे बलि के द्वार।
तीन पग भूमि माँगी, दान स्वरूप।
सहर्ष तैयार हो गए बलि, नीति के अनुरूप।
एक पग में धरती मापी, दूसरे पग से अंबर।
तीसरा पग हेतु बलि निज सर झुका दिये, जोड़े दोनों कर।
खुश हुए प्रभु, दिया बलि को  पाताल लोक का राज्य।
बलि के कहने से,
प्रभु बन गए पाताल लोक के द्वारपाल। 
देवी लक्ष्मी जी,
बलि के पास आईं।
रक्षा बांधी बलि के हाथ, उपहार स्वरूप पति को वापस लाईं।
जब सुदर्शन चक्र से कान्हा की उंगली चोटिल हुई, अपना पल्लू फाड़ द्रौपदी ने कृष्ण की उंगली पर बांध दिया।
कृष्ण हुए भावुक, द्रौपदी को बहन माना, संकट में रक्षा करने का वचन दिया। 
भरी सभा में जब चीर हरण हुआ, द्रौपदी ने कृष्ण को पुकार लिया। 
कृष्ण ने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई, अपना वचन पूरा किया।
चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने, संकट में हुमायूं को राखी भेजी। 
मान रखा हुमायूं ने राखी की, कर्णावती की मदद को अपनी सेना भेजी।
कहते हैं सिकंदर की पत्नी रोक्साना ने पोरस को राखी भेजी, सिकंदर को नुकसान न पहुंचने का किया मनुहार।
पोरस ने राखी का मान रखा, नहीं किया सिकंदर पर वार।
भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक राखी का त्योहार, भारत में धूमधाम से मनाते  हैं।
भाई-बहन चाहे जितनी दूर रहें, राखी का त्यौहार  मिलकर ही मनाते हैं।
बहन रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई से थाली सजाती, भाई को टीका करती।
भाई की आरती उतारती, भाई के हाथ राखी बांधती।
अपने हाथ से मिठाई खिला, भाई का मुंह मीठा करती।
भाई की लंबी आयु की प्रार्थना, बहन ईश्वर से करती।
भाई राखी बंधवाता, बहन को देता उपहार।
भाई बहन की रक्षा करने का संकल्प लेता, ईश्वर से प्रार्थना करता, बहन का सुखी रहे संसार।
ये त्यौहार ही हैं जो हमको जोड़े रहते हैं।
ये त्योहार ही हमारी संस्कृति को संभाल कर रखते हैं।
अपनों को करीब रखते, हमारे ये त्योहार।
अपने अगर संग है तो हर दिन है त्यौहार। 

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
West bangal 

Sunday, 20 September 2026

दूसरों के मन की बात को जानना सीखें - जौली अंकल

दूसरों के मन की बात को जानना सीखें - जौली अंकल

इंसान की ख़ामोशी और उसकी शारीरिक भाषा अक्सर शब्दों से कहीं अधिक सच बोलती है। अगर आप केवल व्यक्ति की बातों को सुनते हैं, तो आप आधी-अधूरी सच्चाई ही जान पाते हैं। बिना बोले बहुत कुछ समझना कोई जादू नहीं, बल्कि मानव व्यवहार (Human Behavior) और मनोविज्ञान का एक वैज्ञानिक पहलू है। जब हम किसी व्यक्ति के हाव-भाव, चेहरे के भाव और बैठने-उठने के तरीके पर ध्यान देना शुरू करते हैं, तो हमें उनकी सोच, नीयत और छिपी हुई भावनाओं का स्पष्ट आभास होने लगता है। इंसान क्या सोच रहा है, उसकी मनःस्थिति क्या है और वह आपसे कितना सच या झूठ बोल रहा है, इसे थोड़ा ध्यान और अभ्यास से समझना  बेहद आसान हो सकता है।

बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के एक्सप्रेशन्स में किसी भी व्यक्ति की वास्तविक भावनाएं छिपी होती हैं। असली (Real) और नकली (Fake) मुस्कान को पहचानना बेहद सरल है, जब कोई दिल से मुस्कुराता है, तो उसकी आंखों के कोनों पर हल्की झुर्रियां (Crow's feet) बनती हैं और आंखें छोटी हो जाती हैं, जबकि केवल होठों को फैलाकर दी गई मुस्कान दिखावटी होती है। इसके अलावा, आंखों का संपर्क (Eye Contact) मन के द्वार खोलता है। लगातार और संतुलित आई कांटेक्ट आत्मविश्वास दर्शाता है, जबकि बात करते समय बार-बार आंखें चुराना, नजरें नीचे करना या पलकों को जरूरत से ज्यादा झपकाना घबराहट या कुछ छिपाने का संकेत होता है। व्यक्ति के पैर किस दिशा में हैं, यह भी उसकी रुचि को प्रकट करता है, यदि बातचीत के दौरान किसी के पैरों के पंजे आपकी तरफ हैं, तो वह आपकी बात में रुचि ले रहा है, और यदि पैर दरवाजे या बाहर की ओर मुड़े हैं, तो उसका मन वहां से जाने का है।

किसी व्यक्ति की मानसिकता और व्यक्तित्व को समझने में उसकी लिखावट (Handwriting) की सजावट, बनावट और दिखावट के पैटर्न भी बहुत बड़ी भूमिका निभाते है। हस्तलेखन और हस्ताक्षर वास्तव में मस्तिष्क के अवचेतन मन का दर्पण होते हैं। बड़े और स्पष्ट अक्षर लिखने वाले लोग आमतौर पर खुले विचारों वाले और सामाजिक होते हैं, जबकि छोटे और बारीक अक्षर लिखने वाले लोग गहरे विचारक, एकाग्र और थोड़े शर्मीले स्वभाव के हो सकते हैं। शब्दों के बीच की दूरी, लिखने का झुकाव (Tilt) और पेन का दबाव यह बताता है कि व्यक्ति का भावनात्मक संतुलन कैसा है। पर्सनालिटी टेस्ट और इन साइकोलॉजिकल ट्रिक्स की मदद से आप किसी के भी माइंड और सोच के पैटर्न को आसानी से डिकोड कर सकते हैं।

शांत रहने यानी साइलेंस (Silence) की पावर माइंड रीडिंग की सबसे बड़ी चाबी है। जब आप बातचीत के दौरान खुद चुप रहते हैं और केवल एक सजग श्रोता (Active Listener) बनते हैं, तो सामने वाला व्यक्ति सहज महसूस करता है और अपने मन के विचार खुद-ब-खुद प्रकट करने लगता है। ख़ामोशी आपको दूसरों के सूक्ष्म भावों, बॉडी लैंग्वेज और आवाज़ के उतार-चढ़ाव (Tone of Voice) को गहराई से समझाने का पूरा अवसर देती है। दूसरों के भावों और भावनाओं को पढ़ने की कला किसी पर हावी होने के लिए नहीं, बल्कि आपसी संबंधों में बेहतर तालमेल, सहानुभूति और विश्वास कायम करने के लिए अपनाई जाती है।

जौली अंकल बताते है कि दुनिया के महान विचारकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि महानता दूसरों पर हावी होने में नहीं, बल्कि उन्हें बिना शर्त समझने में है। जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान यही है कि आप शब्दों के पार जाकर इंसान के दिल और आत्मा की आवाज को सुनें। जब आप दूसरों के मन को सहानुभूति और निस्वार्थ प्रेम से पढ़ने की कोशिश करेंगे, तो आपके संबंध न केवल मजबूत होंगे बल्कि आपका अपना जीवन भी असीम शांति और सकारात्मकता से भर जाएगा। याद रखिए, एक सच्चा और संवेदनशील इंसान वही है जो दूसरों के बिना कहे उनके दर्द, खुशी और विचारों को महसूस कर सके। हमेशा मुस्कुराते रहिए, दिल से जुड़िए और दुनिया में खुशियां बांटते रहिए।
- जौली अंकल

Thursday, 17 September 2026

जीवन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

जीवन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 

चौरासी लाख योनि में, मानव जीवन हमको मिला।
कभी अपने जीवन से हम खुश रहते, कभी होती हमें अपने जीवन से गिला।
जीवन की राह केवल फूलों से सजी नहीं होती, काँटें भी सामने आते हैं।
विवेकशील मनुष्य काँटों से बचते हुए, आगे बढ़ते जाते हैं।
जीवन एक अमूल्य यात्रा है, इस यात्रा को अच्छा या बुरा बनाना है हमारे हाथ।
सत्कर्म करने वालों के साथ, सदा रहतें प्रभु श्री नाथ।
जीवन में 
उतार- चढ़ाव आते रहते हैं, 
राहें समतल नहीं मिलतीं।
कभी छोटी-छोटी समस्याएँ आतीं, कभी स्थितियाँ विकट दिखतीं।
जन्म से लेकर मृत्यु तक हम अपनी, जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश करते हैं।
जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश में, कभी कष्ट सहते, कभी खुश रहते हैं।
चलते-चलते पांँव में छाले पड़े तो क्या हुआ, सोचो मंजिल 
अब पास ही है।
अपने से कम सुविधा वालों को देखो, लगेगा सबसे सुखी तो हम ही हैं।
कुंदन बनने के लिए, सोना को भी तपना पड़ता है।
कठिन परिस्थितियों में धैर्य जो रखता, जीवन में वही निरंतर आगे बढ़ता है।
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए,"  विवेकानंद जी के वचन। 
"जीवन साइकिल चलाने जैसा है। अपना संतुलन बनाए रखने के लिए आपको आगे बढ़ते रहना चाहिए" अल्बर्ट आइंस्टीन जी के कथन।
इरादा यदि नेक हो, 
कभी भी झुकना नहीं। 
दूसरों के जीवन को खुशियों से भरो, वही रास्ता चुनो जो हो सही।
औरों की बात सुनो ज्यादा, खुद बोलो कम।
परोपकार में अपना जीवन लगाओ, बाँटो सबके गम।
अपनी शिक्षा, अपनी प्रतिभा, इसे अपने जीवन की पूंजी  बनाओ।
सकारात्मक सोच रखो, वर्तमान को सुखमय बनाओ।
"अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति।
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव - भीत?" पत्नी रत्नावली जी के इस वाक्य ने तुलसीदास जी का जीवन बदल दिया।
वृद्धावस्था, बीमारी, मृत्यु और संन्यासी का दृश्य,
राजकुमार सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बना दिया।
एक घटना ही काफी होता, जीवन बदलने के लिए। 
खुद के लिए जिए तो क्या जिए, अपना जीवन अर्पण कर दो औरों के हित के लिए। 
अपने अनुभव से सीखो, अपनी अच्छाइयों को पूंजी बनाओ।
निरंतर आगे बढ़ते रहो, अपने जीवन की बगिया महकाओ।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
वैस्ट बंगाल 

मृत्यु - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 

मृत्यु - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 
जबलपुर मध्यप्रदेश 
कविता... मृत्यु

जीवन मृत्यु अटल सत्य है
एक दिन सबकी होनी है ।
जिसका जन्म यहां हुआ है
एक दिन मृत्यु भी होनी है ।

जीवन में संघर्ष यहां है
सुख दुख आते जाते है ।
जीवन और मृत्यु के बीच मेंं
संघर्ष मय जीवन जीते है ।

कोई यहां कुछ नही लाया है
न कुछ लेकर ही, जायेगा ।
खाली हाथ ही सब आये हैंं
सारा सच खाली हाथ जायेगा ।

कोई गरीब न कोई अमीर है
कर्म का फल सबको मिलता है ।
सारा सच है जैसा जो करेगा
फल भी वैसा ही मिलता है  ।

जीवन की इस मोह माया में
यहां सभी ,भटकते रहते है ।
ये तेरा है वो मेरा है यही तो
इन्सान  बस सोचते रहते हैं ।

बचपन और युवापन मेंं
खेले कूंदे और जवान हुये ।
बीती जवानी मौज मस्ती में
 बुढ़ापे को देख घबड़ा गये ।

संघर्ष भरे इस जीवन में
सारा सच ईश्वर को भूल गये ।
जिसने उसको याद किया
जीवन से मोक्ष, भी पा गये ।

जीवन मिला है कुछ कर लो
मोक्ष उसी से मिल पायेगा ।
सच्चाई के मार्ग पर चलकर
मंजिल अपनी भी पायेगा ।

धर्म कर्म कुछ अच्छे कर लो
ईश्वर से कुछ नाता जोड़ लो ।
नैया पार वो सभी की लगाते
पूजा भजन ईश्वर की कर लो ।

बड़े भाग्य से मानुष तन पाया है
जीवन में कुछ पुण्य भी कर लो
पाप पुण्य का मतलब समझकर 
जीवन की नैया को पार लगा लो।

माता पिता की सेवा करना
मान सम्मान उनका भी करना ।
सारा सच मृत्यु सभी की होना है
वो दिन सभी एक दिन आना है ।

पल बढ़े तिल घंटे मृत्यु 
अपने समय पर ही होना है।
डाक्टर कितनी भी कोशिश करें 
मृत्यु समय पर होना है ।
माता पिता जन्म दाता है
तिरस्कार उनका न करना ।
माता पिता ने सेवा जो की है
उस सेवा को भूल न जाना ।

मृत्यु अपने समय पर आती है
कोई भी बचा नही पाता है।
सारा सच है मिट्टी के शरीर को
शमशान में जला दिया जाता है।

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
   जबलपुर म प्र 

लापरवाही - सुरेश कंठ

लापरवाही - सुरेश कंठ

 रचयिता :- काव्य शिरोमणि 
      वरिष्ठ कवि  “ सुरेश कंठ “
                       *****
 लापरवाही छोटी लगे पर,
 बड़ा नुकसान कर जाती है,
 एक भूल कभी-कभी जीवन, 
 भर की सजा दे जाती है ।
                  (1)
 समय रहते जो काम करें,
 जीवन सुंदर हो जाता है,
 काम टालने वाले अक्सर ,
 पीछे ही रह जाता हैं ।
                  (2 )
सावधानी से कदम बढ़ाए,
 राह सरल हो जाती है, 
जरा सी और असावधानी भी,
 मुश्किल खड़ी कर जाती है।
                  ( 3)
 स्वास्थ्य हो या घर परिवार ,
 ध्यान सभी पर देना है,
 अपने कर्तव्य से कभी नहीं ,
 हमको पीछे हटना है ।
                    (4)
 बूंद बूंद से सागर भरता,
 यह बात सदा याद रखना है ,
 छोटी-छोटी बातों में भी,
 पूरी सावधानी बरतनी है।
                     (5)
 लापरवाही आग समान है ,
 सब कुछ राख बना देती है,
 मेहनत से अर्जित खुशियों,
  पल भर में दूर कर देती है।
                    ( 6 )
 जो जागरूक रहे  जीवन में ,
 वह हर संकट हरता है ,
 सच्चा कर्मठ  इंसान ही ,
 जीवन में आगे बढ़ता है ।
                    (7)
आज संभाल कर काम करें हम,
 कल पछताना क्यों होगा ,
 सावधानी को साथ रखेंगे ,
 जीवन खुशियों से भरेगा ।
                    (8)
 कवि “ सुरेश कंठ “ का कहना,
 हर समय  सावधानी से रहें सतर्क 
 यही जीवन की  मूल मंत्र है,
 कारण हम रहेंगे हर समय सतर्क।
                     (9)
                  जयहिंद 
 रचयिता :---  काव्य शिरोमणि वरिष्ठ कवि 
                      “ सुरेश कंठ”
    कोशी शिविर बथनाहा अररिया बिहार।