राखी - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
असुरों का पलड़ा था भारी, जब हो रहा था देवासुर संग्राम।
देवराज इंद्र ने देवगुरु
वृहस्पति से पूछा, कैसे होगी जीत अपनी, कैसे बनेगा अपना काम।
इंद्र पत्नी इंद्राणी (शची) ने
रक्षा धागा, देवराज इंद्र की कलाई पर बांध दिया।
सावन पूर्णिमा का दिन था वह, जीत हुई इंद्र की, अपना सिंहासन उन्होंने वापस पा लिया।
विश्वास था, इसी धागे ने दिलाई जीत।
सावन पूर्णिमा के दिन, रक्षा बांधने की है रीत।
त्रेता युग में प्रभु ने, लिया वामन अवतार।
कश्यप जी-अदिति जी के पुत्र, पहुंचे बलि के द्वार।
तीन पग भूमि माँगी, दान स्वरूप।
सहर्ष तैयार हो गए बलि, नीति के अनुरूप।
एक पग में धरती मापी, दूसरे पग से अंबर।
तीसरा पग हेतु बलि निज सर झुका दिये, जोड़े दोनों कर।
खुश हुए प्रभु, दिया बलि को पाताल लोक का राज्य।
बलि के कहने से,
प्रभु बन गए पाताल लोक के द्वारपाल।
देवी लक्ष्मी जी,
बलि के पास आईं।
रक्षा बांधी बलि के हाथ, उपहार स्वरूप पति को वापस लाईं।
जब सुदर्शन चक्र से कान्हा की उंगली चोटिल हुई, अपना पल्लू फाड़ द्रौपदी ने कृष्ण की उंगली पर बांध दिया।
कृष्ण हुए भावुक, द्रौपदी को बहन माना, संकट में रक्षा करने का वचन दिया।
भरी सभा में जब चीर हरण हुआ, द्रौपदी ने कृष्ण को पुकार लिया।
कृष्ण ने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई, अपना वचन पूरा किया।
चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने, संकट में हुमायूं को राखी भेजी।
मान रखा हुमायूं ने राखी की, कर्णावती की मदद को अपनी सेना भेजी।
कहते हैं सिकंदर की पत्नी रोक्साना ने पोरस को राखी भेजी, सिकंदर को नुकसान न पहुंचने का किया मनुहार।
पोरस ने राखी का मान रखा, नहीं किया सिकंदर पर वार।
भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक राखी का त्योहार, भारत में धूमधाम से मनाते हैं।
भाई-बहन चाहे जितनी दूर रहें, राखी का त्यौहार मिलकर ही मनाते हैं।
बहन रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई से थाली सजाती, भाई को टीका करती।
भाई की आरती उतारती, भाई के हाथ राखी बांधती।
अपने हाथ से मिठाई खिला, भाई का मुंह मीठा करती।
भाई की लंबी आयु की प्रार्थना, बहन ईश्वर से करती।
भाई राखी बंधवाता, बहन को देता उपहार।
भाई बहन की रक्षा करने का संकल्प लेता, ईश्वर से प्रार्थना करता, बहन का सुखी रहे संसार।
ये त्यौहार ही हैं जो हमको जोड़े रहते हैं।
ये त्योहार ही हमारी संस्कृति को संभाल कर रखते हैं।
अपनों को करीब रखते, हमारे ये त्योहार।
अपने अगर संग है तो हर दिन है त्यौहार।
डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
West bangal

No comments:
Post a Comment