मेरी कलम मेरी पहचान - सुषमा खजूरिया
कलम सिर्फ लकड़ी और स्याही का टुकड़ा नहीं है। मेरे लिए कलम मेरी साँस है, मेरी स्मृति है, मेरी पहचान है।
मैं सुषमा खजूरिया जालंधर में हिन्दी स्कूल प्रवक्ता थी। ब्लैकबोर्ड पर शब्द लिखते-लिखते मैंने सीखा कि शब्दों में शक्ति होती है। वे किसी को रुला सकते हैं, किसी को जगा सकते हैं। शादी के बाद मैं निहाण के आँगन में आई। स्कूल छूट गया, पर शब्दों से नाता नहीं टूटा।
घर की चौखट पर बैठकर मैंने देखा कि मेरे नायक ने बिना नाम कमाए कितनी नेकी की। मेरी जीवन धारा ने मौन रहकर अनुशासन सिखाया। मेरी कहानी के नायक ने ‘नेकी कर कुएं में डाल’ को जीवन बना लिया। ये सब कहानियाँ मेरे मन में जमा होती गईं। एक दिन लगा, अगर मैंने इन्हें नहीं लिखा तो ये खो जाएँगी।
तब उठी मेरी कलम।
लोग पूछते हैं, “आप कौन हैं?” मैंने कहा मैं स्मृतियों के झरोखे से लिखने वाली लेखिका हूं |
मैं कहती हूँ, “मैं वह हूँ जो नायक की नेकी को शब्द देती हूं ।”
मेरे लेखन ने मुझे मेरी जड़ें याद दिलाईं।तब मैंने 'जड़ों की ओर ' कहानी संग्रह लिखा | जब मैं ‘संस्मरण सेतु’ लिख रही थी, तो लगा जैसे पाँच पीढ़ियों का सेतु मेरे हाथों से बन रहा है।
मेरी कलम ने मुझे सिखाया कि पहचान बड़े पदों से नहीं बनती। पहचान उस सच से बनती है जिसे तुम निडर होकर लिख दो।
शिक्षिका के रूप में मैंने छात्रों को पढ़ाया। लेखिका के रूप में मैं अपने देश को पढ़ा रही हूँ। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले कक्षा में आवाज़ गूँजती थी, अब शब्द कागज़ पर गूँजते हैं।
जब ‘मेरी कलम’ से सृजित 'संस्मरण सेतु' का विमोचन हुआ और मेरी पहली प्रति मेरे हाथ में आई, तो लगा जैसे मेरी पहचान छपकर मेरे सामने आ गई हो। वह किताब नहीं थी, वह मेरा आत्मकथन था।
आज मैं कह सकती हूँ कि मेरी पहचान मेरा नाम नहीं, मेरी कलम है।
अगर कल मैं न रहूँ, तो लोग मुझे भूल जाएँगे। पर मेरी कलम रहेगी। वह मेरे काव्य संग्रह 'किरण कोहरा ' की कविताएँ सुनाएगी | 'कारुणिक आवाजें ' कहानी संग्रह की कहानियां सुनाएगी | नेकी कर कुंए में डाल की नैतिकता सुनाएगी, धरती माँ का मौन समझाएगी, नायक के त्याग की गवाही देगी।मेरे 'चीत्कार' उपन्यास की कहानी सुनाएगी | चम्बा के स्कूल में 'चप्पा धूप'
उपन्यास का जिक्र करेगी | 'मानवता कराह उठी ' लेख संग्रह से जीवन की समस्याओं के समाधान देगी |
इसीलिए मैं कहती हूँ
मेरी कलम ही मेरी पहचान है।
जब तक स्याही बहेगी, तब तक यह पहचान अमर रहेगी। मेरे लिए कलम मेरी साँस है, मेरी स्मृति है, मेरी पहचान है। यह वह विचौलिया है जो अतीत और वर्तमान के बीच संधि कराती है। तब उठी मेरी कलम। उसने पीढ़ियों के बीच अनुबंध लिखा।
मेरी कलम ने मुझे मेरी जड़ें याद दिलाईं। ‘संस्मरण सेतु’ लिखते समय लगा जैसे मैं समय से समझौता कर रही हूँ। जो बीत गया उसे मैंने भुलाया नहीं सहेजा | पहचान उस सच से बनती है जिसे मैं निडर होकर लिखती हूं |
कलम मेरी शक्ति है
अगर कल मैं न रहूँ, तो लोग मुझे भूल जाएँगे। मेरे लिए कलम मेरी साँस है, मेरी स्मृति है, मेरी पहचान है। यह वह माध्यम है जो टूटे रिश्तों में सुलह कराती है, बिछड़े लोगों में मेल कराती है और पुराने समय से मिलाप करवाती है।
शिक्षिका से लेखिका तक का सफर करते हुए एक दिन लगा, अगर मैंने मन में आये विषयों को नहीं लिखा तो ये खो जाएँगे ।
तब उठी मेरी कलम। उसने पीढ़ियों के बीच मध्यस्थता की। पुराने और नए विचारों में जोड़ तोड़ करके एक समाधान निकाला।
मेरी कलम ने मुझे मेरी जड़ें याद दिलाईं। ‘संस्मरण सेतु’ लिखते समय लगा जैसे मैं समय से वरगेनिंग कर रही हूँ। जो कड़वा था उसमें रियायत देकर उसे सहेज लिया। जो मीठा था, समाजोपयोगी था उसे शब्दों में बाँध लिया।
सुषमा खजूरिया
बिलासपुर (हि प्र )

No comments:
Post a Comment